उत्पत्ति 1 1 आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृय्वी की सृष्टि की। 2 और पृय्वी बेडौल और सुनसान पक्की यी;	 और गहरे जल के ऊपर अन्धिक्कारनेा या: तया परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता या। 3 तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया। 4 और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; 	और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धिक्कारने से अलग किया। 5 और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धिक्कारने को रात कहा। तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहिला दिन हो गया।। 6 फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए। 7 तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया। 8 और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया।। 9 फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्यान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे; और वैसा ही हो गया। 10 और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृय्वी कहा; तया जो जल इकट्ठा हुआ उसको उस ने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 11 फिर परमेश्वर ने कहा, पृय्वी से हरी घास, तया बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृझ भी जिनके बीज उन्ही में एक एक की जाति के अनुसार होते हैं पृय्वी पर उगें; और वैसा ही हो गया। 12 तो पृय्वी से हरी घास, और छोटे छोटे पेड़ जिन में अपक्की अपक्की जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृझ जिनके बीज एक एक की जाति के अनुसार उन्ही में होते हैं उगे; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 13 तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया।। 14 फिर परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिथे आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षोंके कारण हों। 15 और वे ज्योतियां आकाश के अन्तर में पृय्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें; और वैसा ही हो गया। 16 तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाईं; उन में से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिथे, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिथे बनाया: और तारागण को भी बनाया। 17 परमेश्वर ने उनको आकाश के अन्तर में इसलिथे रखा कि वे पृय्वी पर प्रकाश दें, 18 तया दिन और रात पर प्रभुता करें और उजियाले को अन्धिक्कारने से अलग करें: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 19 तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार चौया दिन हो गया।। 20 फिर परमेश्वर ने कहा, जल जीवित प्राणियोंसे बहुत ही भर जाए, और पक्की पृय्वी के ऊपर आकाश कें अन्तर में उड़ें। 21 इसलिथे परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियोंकी भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया और एक एक जाति के उड़नेवाले पझियोंकी भी सृष्टि की : और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 22 और परमेश्वर ने यह कहके उनको आशीष दी, कि फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्की पृय्वी पर बढ़ें। 23 तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पांचवां दिन हो गया। 24 फिर परमेश्वर ने कहा, पृय्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्यात्‌ घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृय्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों; और वैसा ही हो गया। 25 सो परमेश्वर ने पृय्वी के जाति जाति के वनपशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया : और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 26 फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपके स्वरूप के अनुसार अपक्की समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पझियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृय्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृय्वी पर रेंगते हैं, अधिक्कारने रखें। 27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपके स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपके ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उस ने मनुष्योंकी सृष्टि की। 28 और परमेश्वर ने उनको आशीष दी : और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृय्वी में भर जाओ, और उसको अपके वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तया आकाश के पझियों, और पृय्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओ पर अधिक्कारने रखो। 29 फिर परमेश्वर ने उन से कहा, सुनो, जितने बीजवाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृय्वी के ऊपर हैं और जितने वृझोंमें बीजवाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिथे हैं : 30 और जितने पृय्वी के पशु, और आकाश के पक्की, और पृय्वी पर रेंगनेवाले जन्तु हैं, जिन में जीवन के प्राण हैं, उन सब के खाने के लिथे मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं; और वैसा ही हो गया। 31 तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया या, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है। तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवां दिन हो गया।। उत्पत्ति 2 1 योंआकाश और पृय्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया। 2 और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता या सातवें दिन समाप्त किया। और उस ने अपके किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्रम किया। 3 और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उस में उस ने अपक्की सृष्टि की रचना के सारे काम से विश्रम लिया। 4 आकाश और पृय्वी की उत्पत्ति का वृत्तान्त यह है कि जब वे उत्पन्न हुए अर्यात्‌ जिस दिन यहोवा परमेश्वर ने पृय्वी और आकाश को बनाया: 5 तब मैदान का कोई पौधा भूमि पर न या, और न मैदान का कोई छोटा पेड़ उगा या, क्योंकि यहोवा परमेश्वर ने पृय्वी पर जल नहीं बरसाया या, और भूमि पर खेती करने के लिथे मनुष्य भी नहीं या; 6 तौभी कुहरा पृय्वी से उठता या जिस से सारी भूमि सिंच जाती यी 7 और यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नयनो में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया। 8 और यहोवा परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन देश में एक बाटिका लगाई; और वहां आदम को जिसे उस ने रचा या, रख दिया। 9 और यहोवा परमेश्वर ने भूमि से सब भांति के वृझ, जो देखने में मनोहर और जिनके फल खाने में अच्छे हैं उगाए, और बाटिका के बीच में जीवन के वृझ को और भले या बुरे के ज्ञान के वृझ को भी लगाया। 10 और उस बाटिका को सींचने के लिथे एक महानदी अदन से निकली और वहां से आगे बहकर चार धारा में हो गई। 11 पहिली धारा का नाम पीशोन्‌ है, यह वही है जो हवीला नाम के सारे देश को जहां सोना मिलता है घेरे हुए है। 12 उस देश का सोना चोखा होता है, वहां मोती और सुलैमानी पत्यर भी मिलते हैं। 13 और दूसरी नदी का नाम गीहोन्‌ है, यह वही है जो कूश के सारे देश को घेरे हुए है। 14 और तीसरी नदी का नाम हिद्देकेल्‌ है, यह वही है जो अश्शूर्‌ के पूर्व की ओर बहती है। और चौयी नदी का नाम फरात है। 15 जब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की बाटिका में रख दिया, कि वह उस में काम करे और उसकी रझा करे, 16 तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, कि तू बाटिका के सब वृझोंका फल बिना खटके खा सकता है: 17 पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृझ है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाए उसी दिन अवश्य मर जाएगा।। 18 फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मै उसके लिथे एक ऐसा सहाथक बनाऊंगा जो उस से मेल खाए। 19 और यहोवा परमेश्वर भूमि में से सब जाति के बनैले पशुओं, और आकाश के सब भँाति के पझियोंको रचकर आदम के पास ले आया कि देखे, कि वह उनका क्या क्या नाम रखता है; और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया। 20 सो आदम ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पझियों, और सब जाति के बनैले पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिथे कोई ऐसा सहाथक न मिला जो उस से मेल खा सके। 21 तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को भारी नीन्द में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उस ने उसकी एक पसुली निकालकर उसकी सन्ती मांस भर दिया। 22 और यहोवा परमेश्वर ने उस पसुली को जो उस ने आदम में से निकाली यी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। 23 और आदम ने कहा अब यह मेरी हड्डियोंमें की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है : सो इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है। 24 इस कारण पुरूष अपके माता पिता को छोड़कर अपक्की पत्नी से मिला रहेगा और वे एक तन बनें रहेंगे। 25 और आदम और उसकी पत्नी दोनोंनंगे थे, पर लजाते न थे।। उत्पत्ति 3 1 यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त या, और उस ने स्त्री से कहा, क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस बाटिका के किसी वृझ का फल न खाना ? 2 स्त्री ने सर्प से कहा, इस बाटिका के वृझोंके फल हम खा सकते हैं। 3 पर जो वृझ बाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे। 4 तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे, 5 वरन परमेश्वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखे खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे। 6 सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृझ का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिथे चाहने योग्य भी है, तब उस ने उस में से तोड़कर खाया; और अपके पति को भी दिया, और उस ने भी खाया। 7 तब उन दोनोंकी आंखे खुल गई, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे है; सो उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिथे। 8 तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय बाटिका में फिरता या उसका शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी बाटिका के वृझोंके बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए। 9 तब यहोवा परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, तू कहां है? 10 उस ने कहा, मैं तेरा शब्द बारी में सुनकर डर गया क्योंकि मैं नंगा या; इसलिथे छिप गया। 11 उस ने कहा, किस ने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृझ का फल खाने को मै ने तुझे बर्जा या, क्या तू ने उसका फल खाया है? 12 आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृझ का फल मुझे दिया, और मै ने खाया। 13 तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मै ने खाया। 14 तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, तू ने जो यह किया है इसलिथे तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा : 15 और मै तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करुंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा। 16 फिर स्त्री से उस ने कहा, मै तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा। 17 और आदम से उस ने कहा, तू ने जो अपक्की पत्नी की बात सुनी, और जिस वृझ के फल के विषय मै ने तुझे आज्ञा दी यी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिथे भूमि तेरे कारण शापित है: तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साय खाया करेगा : 18 और वह तेरे लिथे कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा ; 19 और अपके माथे के पक्कीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा। 20 और आदम ने अपक्की पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वही हुई। 21 और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिथे चमड़े के अंगरखे बनाकर उनको पहिना दिए। 22 फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, मनुष्य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है: इसलिथे अब ऐसा न हो, कि वह हाथ बढ़ाकर जीवन के वृझ का फल भी तोड़ के खा ले और सदा जीवित रहे। 23 तब यहोवा परमेश्वर ने उसको अदन की बाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिस मे से वह बनाया गया या। 24 इसलिथे आदम को उस ने निकाल दिया और जीवन के वृझ के मार्ग का पहरा देने के लिथे अदन की बाटिका के पूर्व की ओर करुबोंको, और चारोंओर घूमनेवाली ज्वालामय तलवार को भी नियुक्त कर दिया।। उत्पत्ति 4 1 जब आदम अपक्की पत्नी हव्वा के पास गया तब उस ने गर्भवती होकर कैन को जन्म दिया और कहा, मै ने यहोवा की सहाथता से एक पुरूष पाया है। 2 फिर वह उसके भाई हाबिल को भी जन्मी, और हाबिल तो भेड़-बकरियोंका चरवाहा बन गया, परन्तु कैन भूमि की खेती करने वाला किसान बना। 3 कुछ दिनोंके पश्चात्‌ कैन यहोवा के पास भूमि की उपज में से कुछ भेंट ले आया। 4 और हाबिल भी अपक्की भेड़-बकरियोंके कई एक पहिलौठे बच्चे भेंट चढ़ाने ले आया और उनकी चर्बी भेंट चढ़ाई; तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया, 5 परन्तु कैन और उसकी भेंट को उस ने ग्रहण न किया। तब कैन अति क्रोधित हुआ, और उसके मुंह पर उदासी छा गई। 6 तब यहोवा ने कैन से कहा, तू क्योंक्रोधित हुआ ? और तेरे मुंह पर उदासी क्योंछा गई है ? 7 यदि तू भला करे, तो क्या तेरी भेंट ग्रहण न की जाएगी ? और यदि तू भला न करे, तो पाप द्वार पर छिपा रहता है, और उसकी लालसा तेरी और होगी, और तू उस पर प्रभुता करेगा। 8 तब कैन ने अपके भाई हाबिल से कुछ कहा : और जब वे मैदान में थे, तब कैन ने अपके भाई हाबिल पर चढ़कर उसे घात किया। 9 तब यहोवा ने कैन से पूछा, तेरा भाई हाबिल कहां है ? उस ने कहा मालूम नहीं : क्या मै अपके भाई का रखवाला हूं ? 10 उस ने कहा, तू ने क्या किया है ? तेरे भाई का लोहू भूमि में से मेरी ओर चिल्लाकर मेरी दोहाई दे रहा है ! 11 इसलिथे अब भूमि जिस ने तेरे भाई का लोहू तेरे हाथ से पीने के लिथे अपना मुंह खोला है, उसकी ओर से तू शापित है। 12 चाहे तू भूमि पर खेती करे, तौभी उसकी पूरी उपज फिर तुझे न मिलेगी, और तू पृय्वी पर बहेतू और भगोड़ा होगा। 13 तब कैन ने यहोवा से कहा, मेरा दण्ड सहने से बाहर है। 14 देख, तू ने आज के दिन मुझे भूमि पर से निकाला है और मै तेरी दृष्टि की आड़ मे रहूंगा और पृय्वी पर बहेतू और भगोड़ा रहूंगा; और जो कोई मुझे पाएगा, मुझे घात करेगा। 15 इस कारण यहोवा ने उस से कहा, जो कोई कैन को घात करेगा उस से सात गुणा पलटा लिया जाएगा। और यहोवा ने कैन के लिथे एक चिन्ह ठहराया ऐसा ने हो कि कोई उसे पाकर मार डाले।। 16 तब कैन यहोवा के सम्मुख से निकल गया, और नोद्‌ नाम देश में, जो अदन के पूर्व की ओर है, रहने लगा। 17 जब कैन अपक्की पत्नी के पास गया जब वह गर्भवती हुई और हनोक को जन्मी, फिर कैन ने एक नगर बसाया और उस नगर का नाम अपके पुत्र के नाम पर हनोक रखा। 18 और हनोक से ईराद उत्पन्न हुआ, और ईराद ने महूयाएल को जन्म दिया, और महूयाएल ने मतूशाएल को, और मतूशाएल ने लेमेक को जन्म दिया। 19 और लेमेक ने दो स्त्रियां ब्याह ली : जिन में से एक का नाम आदा, और दूसरी को सिल्ला है। 20 और आदा ने याबाल को जन्म दिया। वह तम्बुओं में रहना और जानवरोंका पालन इन दोनो रीतियोंका उत्पादक हुआ। 21 और उसके भाई का नाम यूबाल है : वह वीणा और बांसुरी आदि बाजोंके बजाने की सारी रीति का उत्पादक हुआ। 22 और सिल्ला ने भी तूबल्कैन नाम एक पुत्र को जन्म दिया : वह पीतल और लोहे के सब धारवाले हयियारोंका गढ़नेवाला हुआ: और तूबल्कैन की बहिन नामा यी। 23 और लेमेक ने अपक्की पत्नियोंसे कहा, हे आदा और हे सिल्ला मेरी सुनो; हे लेमेक की पत्नियों, मेरी बात पर कान लगाओ: मैंने एक पुरूष को जो मेरे चोट लगाता या, अर्यात्‌ एक जवान को जो मुझे घायल करता या, घात किया है। 24 जब कैन का पलटा सातगुणा लिया जाएगा। तो लेमेक का सतहरगुणा लिया जाएगा। 25 और आदम अपक्की पत्नी के पास फिर गया; और उस ने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम यह कह के शेत रखा, कि परमेश्वर ने मेरे लिथे हाबिल की सन्ती, जिसको कैन ने घात किया, एक और वंश ठहरा दिया है। 26 और शेत के भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और उस ने उसका नाम एनोश रखा, उसी समय से लोग यहोवा से प्रार्यना करने लगे।। उत्पत्ति 5 1 आदम की वंशावली यह है। जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की तब अपके ही स्वरूप में उसको बनाया; 2 उस ने नर और नारी करके मनुष्योंकी सृष्टि की और उन्हें आशीष दी, और उनकी सृष्टि के दिन उनका नाम आदम रखा। 3 जब आदम एक सौ तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा उसकी समानता में उस ही के स्वरूप के अनुसार एक पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम शेत रखा। 4 और शेत के जन्म के पश्चात्‌ आदम आठ सौ वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं। 5 और आदम की कुल अवस्या नौ सौ तीस वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 6 जब शेत एक सौ पांच वर्ष का हुआ, तब उस ने एनोश को जन्म दिया। 7 और एनोश के जन्म के पश्चात्‌ शेत आठ सौ सात वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं। 8 और शेत की कुल अवस्या नौ सौ बारह वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 9 जब एनोश नब्बे वर्ष का हुआ, तब उस ने केनान को जन्म दिया। 10 और केनान के जन्म के पश्चात्‌ एनोश आठ सौ पन्द्रह वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां हुई। 11 और एनोश की कुल अवस्या नौ सौ पांच वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 12 जब केनान सत्तर वर्ष का हुआ, तब उस ने महललेल को जन्म दिया। 13 और महललेल के जन्म के पश्चात्‌ केनान आठ सौ चालीस वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 14 और केनान की कुल अवस्या नौ सौ दस वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 15 जब महललेल पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उस ने थेरेद को जन्म दिया। 16 और थेरेद के जन्म के पश्चात्‌ महललेल आठ सौ तीस वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 17 और महललेल की कुल अवस्या आठ सौ पंचानवे वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 18 जब थेरेद एक सौ बासठ वर्ष का हुआ, जब उस ने हनोक को जन्म दिया। 19 और हनोक के जन्म के पश्चात्‌ थेरेद आठ सौ वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 20 और थेरेद की कुल अवस्या नौ सौ बासठ वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया। 21 जब हनोक पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उस ने मतूशेलह को जन्म दिया। 22 और मतूशेलह के जन्म के पश्चात्‌ हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्वर के साय साय चलता रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 23 और हनोक की कुल अवस्या तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई। 24 और हनोक परमेश्वर के साय साय चलता या; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया। 25 जब मतूशेलह एक सौ सत्तासी वर्ष का हुआ, तब उस ने लेमेक को जन्म दिया। 26 और लेमेक के जन्म के पश्चात्‌ मतूशेलह सात सौ बयासी वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 27 और मतूशेलह की कुल अवस्या नौ सौ उनहत्तर वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 28 जब लेमेक एक सौ बयासी वर्ष का हुआ, तब उस ने एक पुत्र जन्म दिया। 29 और यह कहकर उसका नाम नूह रखा, कि यहोवा ने जो पृय्वी को शाप दिया है, उसके विषय यह लड़का हमारे काम में, और उस कठिन परिश्र्म में जो हम करते हैं, हम को शान्ति देगा। 30 और नूह के जन्म के पश्चात्‌ लेमेक पांच सौ पंचानवे वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 31 और लेमेक की कुल अवस्या सात सौ सतहत्तर वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 32 और नूह पांच सौ वर्ष का हुआ; और नूह ने शेम, और हाम और थेपेत को जन्म दिया।। उत्पत्ति 6 1 फिर जब मनुष्य भूमि के ऊपर बहुत बढ़ने लगे, और उनके बेटियां उत्पन्न हुई, 2 तब परमेश्वर के पुत्रोंने मनुष्य की पुत्रियोंको देखा, कि वे सुन्दर हैं; सो उन्होंने जिस जिसको चाहा उन से ब्याह कर लिया। 3 और यहोवा ने कहा, मेरा आत्मा मनुष्य से सदा लोंविवाद करता न रहेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है : उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी। 4 उन दिनोंमें पृय्वी पर दानव रहते थे; और इसके पश्चात्‌ जब परमेश्वर के पुत्र मनुष्य की पुत्रियोंके पास गए तब उनके द्वारा जो सन्तान उत्पन्न हुए, वे पुत्र शूरवीर होते थे, जिनकी कीत्तिर् प्राचीनकाल से प्रचलित है। 5 और यहोवा ने देखा, कि मनुष्योंकी बुराई पृय्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है। 6 और यहोवा पृय्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। 7 तब यहोवा ने सोचा, कि मै मनुष्य को जिसकी मै ने सृष्टि की है पृय्वी के ऊपर से मिटा दूंगा क्योंकि मैं उनके बनाने से पछताता हूं। 8 परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि नूह पर बनी रही।। 9 नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरूष और अपके समय के लोगोंमें खरा या, और नूह परमेश्वर ही के साय साय चलता रहा। 10 और नूह से, शेम, और हाम, और थेपेत नाम, तीन पुत्र उत्पन्न हुए। 11 उस समय पृय्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई यी, और उपद्रव से भर गई यी। 12 और परमेश्वर ने पृय्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा, कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियोंने पृय्वी पर अपक्की अपक्की चाल चलन बिगाड़ ली यी। 13 तब परमेश्वर ने नूह से कहा, सब प्राणियोंके अन्त करने का प्रश्न मेरे साम्हने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृय्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिथे मै उनको पृय्वी समेत नाश कर डालूंगा। 14 इसलिथे तू गोपेर वृझ की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उस में कोठरियां बनाना, और भीतर बाहर उस पर राल लगाना। 15 और इस ढंग से उसको बनाना : जहाज की लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊंचाई तीस हाथ की हो। 16 जहाज में एक खिड़की बनाना, और इसके एक हाथ ऊपर से उसकी छत बनाना, और जहाज की एक अलंग में एक द्वार रखना, और जहाज में पहिला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना। 17 और सुन, मैं आप पृय्वी पर जलप्रलय करके सब प्राणियोंको, जिन में जीवन की आत्मा है, आकाश के नीचे से नाश करने पर हूं : और सब जो पृय्वी पर है मर जाएंगे। 18 परन्तु तेरे संग मै वाचा बान्धता हूं : इसलिथे तू अपके पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। 19 और सब जीवित प्राणियोंमें से, तू एक एक जाति के दो दो, अर्यात्‌ एक नर और एक मादा जहाज में ले जाकर, अपके साय जीवित रखना। 20 एक एक जाति के पक्की, और एक एक जाति के पशु, और एक एक जाति के भूमि पर रेंगनेवाले, सब में से दो दो तेरे पास आएंगे, कि तू उनको जीवित रखे। 21 और भांति भांति का भोज्य पदार्य जो खाया जाता है, उनको तू लेकर अपके पास इकट्ठा कर रखना सो तेरे और उनके भोजन के लिथे होगा। 22 परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया। उत्पत्ति 7 1 और यहोवा ने नूह से कहा, तू अपके सारे घराने समेत जहाज में जा; क्योंकि मै ने इस समय के लोगोंमें से केवल तुझी को अपक्की दृष्टि में धर्मी देखा है। 2 सब जाति के शुद्ध पशुओं में से तो तू सात सात, अर्यात्‌ नर और मादा लेना : पर जो पशु शुद्ध नहीं है, उन में से दो दो लेना, अर्यात्‌ नर और मादा : 3 और आकाश के पझियोंमें से भी, सात सात, अर्यात्‌ नर और मादा लेना : कि उनका वंश बचकर सारी पृय्वी के ऊपर बना रहे। 4 क्योंकि अब सात दिन और बीतने पर मैं पृय्वी पर चालीस दिन और चालीस रात तक जल बरसाता रहूंगा; जितनी वस्तुएं मैं ने बनाईं है सब को भूमि के ऊपर से मिटा दूंगा। 5 यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया। 6 नूह की अवस्या छ: सौ वर्ष की यी, जब जलप्रलय पृय्वी पर आया। 7 नूह अपके पुत्रों, पत्नी और बहुओं समेत, जलप्रलय से बचने के लिथे जहाज में गया। 8 और शुद्ध, और अशुद्ध दोनो प्रकार के पशुओं में से, पझियों, 9 और भूमि पर रेंगनेवालोंमें से भी, दो दो, अर्यात्‌ नर और मादा, जहाज में नूह के पास गए, जिस प्रकार परमेश्वर ने नूह को आज्ञा दी यी। 10 सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृय्वी पर आने लगा। 11 जब नूह की अवस्या के छ: सौवें वर्ष के दूसरे महीने का सत्तरहवां दिन आया; उसी दिन बड़े गहिरे समुद्र के सब सोते फूट निकले और आकाश के फरोखे खुल गए। 12 और वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृय्वी पर होती रही। 13 ठीक उसी दिन नूह अपके पुत्र शेम, हाम, और थेपेत, और अपक्की पत्नी, और तीनोंबहुओं समेत, 14 और उनके संग एक एक जाति के सब बनैले पशु, और एक एक जाति के सब घरेलू पशु, और एक एक जाति के सब पृय्वी पर रेंगनेवाले, और एक एक जाति के सब उड़नेवाले पक्की, जहाज में गए। 15 जितने प्राणियोंमें जीवन की आत्मा यी उनकी सब जातियोंमें से दो दो नूह के पास जहाज में गए। 16 और जो गए, वह परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार सब जाति के प्राणियोंमें से नर और मादा गए। तब यहोवा ने उसका द्वार बन्द कर दिया। 17 और पृय्वी पर चालीस दिन तक प्रलय होता रहा; और पानी बहुत बढ़ता ही गया जिस से जहाज ऊपर को उठने लगा, और वह पृय्वी पर से ऊंचा उठ गया। 18 और जल बढ़ते बढ़ते पृय्वी पर बहुत ही बढ़ गया, और जहाज जल के ऊपर ऊपर तैरता रहा। 19 और जल पृय्वी पर अत्यन्त बढ़ गया, यहां तक कि सारी धरती पर जितने बड़े बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए। 20 जल तो पन्द्रह हाथ ऊपर बढ़ गया, और पहाड़ भी डूब गए 21 और क्या पक्की, क्या घरेलू पशु, क्या बनैले पशु, और पृय्वी पर सब चलनेवाले प्राणी, और जितने जन्तु पृय्वी मे बहुतायत से भर गए थे, वे सब, और सब मनुष्य मर गए। 22 जो जो स्यल पर थे उन में से जितनोंके नयनोंमें जीवन का श्वास या, सब मर मिटे। 23 और क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या रेंगनेवाले जन्तु, क्या आकाश के पक्की, जो जो भूमि पर थे, सो सब पृय्वी पर से मिट गए; केवल नूह, और जितने उसके संग जहाज में थे, वे ही बच गए। 24 और जल पृय्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा।। उत्पत्ति 8 1 और परमेश्वर ने नूह की, और जितने बनैले पशु, और घरेलू पशु उसके संग जहाज में थे, उन सभोंकी सुधि ली : और परमेश्वर ने पृय्वी पर पवन बहाई, और जल घटने लगा। 2 और गहिरे समुद्र के सोते और आकाश के फरोखे बंद हो गए; और उस से जो वर्षा होती यी सो भी यम गई। 3 और एक सौ पचास दिन के पशचात्‌ जल पृय्वी पर से लगातार घटने लगा। 4 सातवें महीने के सत्तरहवें दिन को, जहाज अरारात नाम पहाड़ पर टिक गया। 5 और जल दसवें महीने तक घटता चला गया, और दसवें महीने के पहिले दिन को, पहाड़ोंकी चोटियाँ दिखलाई दीं। 6 फिर ऐसा हुआ कि चालीस दिन के पश्चात्‌ नूह ने अपके बनाए हुए जहाज की खिड़की को खोलकर, एक कौआ उड़ा दिया : 7 जब तक जल पृय्वी पर से सूख न गया, तब तक कौआ इधर उधर फिरता रहा। 8 फिर उस ने अपके पास से एक कबूतरी को उड़ा दिया, कि देखें कि जल भूमि से घट गया कि नहीं। 9 उस कबूतरी को अपके पैर के तले टेकने के लिथे कोई आधार ने मिला, सो वह उसके पास जहाज में लौट आई : क्योंकि सारी पृय्वी के ऊपर जल ही जल छाया या तब उस ने हाथ बढ़ाकर उसे अपके पास जहाज में ले लिया। 10 तब और सात दिन तक ठहरकर, उस ने उसी कबूतरी को जहाज में से फिर उड़ा दिया। 11 और कबूतरी सांफ के समय उसके पास आ गई, तो क्या देखा कि उसकी चोंच में जलपाई का एक नया पत्ता है; इस से नूह ने जान लिया, कि जल पृय्वी पर घट गया है। 12 फिर उस ने सात दिन और ठहरकर उसी कबूतरी को उड़ा दिया; और वह उसके पास फिर कभी लौटकर न आई। 13 फिर ऐसा हुआ कि छ: सौ एक वर्ष के पहिले महीने के पहिले दिन जल पृय्वी पर से सूख गया। तब नूह ने जहाज की छत खोलकर क्या देखा कि धरती सूख गई है। 14 और दूसरे महीने के सताईसवें दिन को पृय्वी पूरी रीति से सूख गई।। 15 तब परमेश्वर ने, नूह से कहा, 16 तू अपके पुत्रों, पत्नी, और बहुओं समेत जहाज में से निकल आ। 17 क्या पक्की, क्या पशु, क्या सब भांति के रेंगनेवाले जन्तु जो पृय्वी पर रेंगते हैं, जितने शरीरधारी जीवजन्तु तेरे संग हैं, उस सब को अपके साय निकाल ले आ, कि पृय्वी पर उन से बहुत बच्चे उत्पन्न हों; और वे फूलें-फलें, और पृय्वी पर फैल जाएं। 18 तब नूह, और उसके पुत्र, और पत्नी, और बहुएं, निकल आईं : 19 और सब चौपाए, रेंगनेवाले जन्तु, और पक्की, और जितने जीवजन्तु पृय्वी पर चलते फिरते हैं, सो सब जाति जाति करके जहाज में से निकल आए। 20 तब नूह ने यहोवा के लिथे एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं, और सब शुद्ध पझियोंमें से, कुछ कुछ लेकर वेदी पर होमबलि चढ़ाया। 21 इस पर यहोवा ने सुखदायक सुगन्ध पाकर सोचा, कि मनुष्य के कारण मैं फिर कभी भूमि को शाप न दूंगा, यद्यपि मनुष्य के मन में बचपन से जो कुछ उत्पन्न होता है सो बुरा ही होता है; तौभी जैसा मैं ने सब जीवोंको अब मारा है, वैसा उनको फिर कभी न मारूंगा। 22 अब से जब तक पृय्वी बनी रहेगी, तब तक बोने और काटने के समय, ठण्ड और तपन, धूपकाल और शीतकाल, दिन और रात, निरन्तर होते चले जाएंगे।। उत्पत्ति 9 1 फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रोंको आशीष दी और उन से कहा कि फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृय्वी में भर जाओ। 2 और तुम्हारा डर और भय पृय्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पझियों, और भूमि पर के सब रेंगनेवाले जन्तुओं, और समुद्र की सब मछलियोंपर बना रहेगा : वे सब तुम्हारे वश में कर दिए जाते हैं। 3 सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसा तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूं। 4 पर मांस को प्राण समेत अर्यात्‌ लोहू समेत तुम न खाना। 5 और निश्चय मैं तुम्हारा लोहू अर्यात्‌ प्राण का पलटा लूंगा : सब पशुओं, और मनुष्यों, दोनोंसे मैं उसे लूंगा : मनुष्य के प्राण का पलटा मै एक एक के भाई बन्धु से लूंगा। 6 जो कोई मनुष्य का लोहू बहाएगा उसका लोहू मनुष्य ही से बहाथा जाएगा क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपके ही स्वरूप के अनुसार बनाया है। 7 और तुम तो फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृय्वी में बहुत बच्चे जन्मा के उस में भर जाओ।। 8 फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रोंसे कहा, 9 सुनों, मैं तुम्हारे साय और तुम्हारे पश्चात्‌ जो तुम्हारा वंश होगा, उसके साय भी वाचा बान्धता हूं। 10 और सब जीवित प्राणियोंसे भी जो तुम्हारे संग है क्या पक्की क्या घरेलू पशु, क्या पृय्वी के सब बनैले पशु, पृय्वी के जितने जीवजन्तु जहाज से निकले हैं; सब के साय भी मेरी यह वाचा बन्धती है : 11 और मै तुम्हारे साय अपक्की इस वाचा को पूरा करूंगा; कि सब प्राणी फिर जलप्रलय से नाश न होंगे : और पृय्वी के नाश करने के लिथे फिर जलप्रलय न होगा। 12 फिर परमेश्वर ने कहा, जो वाचा मै तुम्हारे साय, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साय भी युग युग की पीढिय़ोंके लिथे बान्धता हूं; उसका यह चिन्ह है : 13 कि मैं ने बादल मे अपना धनुष रखा है वह मेरे और पृय्वी के बीच में वाचा का चिन्ह होगा। 14 और जब मैं पृय्वी पर बादल फैलाऊं जब बादल में धनुष देख पकेगा। 15 तब मेरी जो वाचा तुम्हारे और सब जीवित शरीरधारी प्राणियोंके साय बान्धी है; उसको मैं स्मरण करूंगा, तब ऐसा जलप्रलय फिर न होगा जिस से सब प्राणियोंका विनाश हो। 16 बादल में जो धनुष होगा मैं उसे देख के यह सदा की वाचा स्मरण करूंगा जो परमेश्वर के और पृय्वी पर के सब जीवित शरीरधारी प्राणियोंके बीच बन्धी है। 17 फिर परमेश्वर ने नूह से कहा जो वाचा मैं ने पृय्वी भर के सब प्राणियोंके साय बान्धी है, उसका चिन्ह यही है।। 18 नूह के जो पुत्र जहाज में से निकले, वे शेम, हाम, और थेपेत थे : और हाम तो कनान का पिता हुआ। 19 नूह के तीन पुत्र थे ही हैं, और इनका वंश सारी पृय्वी पर फैल गया। 20 और नूह किसानी करने लगा, और उस ने दाख की बारी लगाई। 21 और वह दाखमधु पीकर मतवाला हुआ; और अपके तम्बू के भीतर नंगा हो गया। 22 तब कनान के पिता हाम ने, अपके पिता को नंगा देखा, और बाहर आकर अपके दोनोंभाइयोंको बतला दिया। 23 तब शेम और थेपेत दोनोंने कपड़ा लेकर अपके कन्धोंपर रखा, और पीछे की ओर उलटा चलकर अपके पिता के नंगे तन को ढ़ाप दिया, और वे अपना मुख पीछे किए हुए थे इसलिथे उन्होंने अपके पिता को नंगा न देखा। 24 जब नूह का नशा उतर गया, तब उस ने जान लिया कि उसके छोटे पुत्र ने उस से क्या किया है। 25 इसलिथे उस ने कहा, कनान शापित हो : वह अपके भाई बन्धुओं के दासोंका दास हो। 26 फिर उस ने कहा, शेम का परमेश्वर यहोवा धन्य है, और कनान शेम का दास होवे। 27 परमेश्वर थेपेत के वंश को फैलाए; और वह शेम के तम्बुओं मे बसे, और कनान उसका दास होवे। 28 जलप्रलय के पश्चात्‌ नूह साढ़े तीन सौ वर्ष जीवित रहा। 29 और नूह की कुल अवस्या साढ़े नौ सौ वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया। उत्पत्ति 10 1 नूह के पुत्र जो शेम, हाम और थेपेत थे उनके पुत्र जलप्रलय के पश्चात्‌ उत्पन्न हुए : उनकी वंशावली यह है।। 2 थेपेत के पुत्र : गोमेर, मागोग, मादै, यावान, तूबल, मेशेक, और तीरास हुए। 3 और गोमेर के पुत्र : अशकनज, रीपत, और तोगर्मा हुए। 4 और यावान के वंश में एलीशा, और तर्शीश, और कित्ती, और दोदानी लोग हुए। 5 इनके वंश अन्यजातियोंके द्वीपोंके देशोंमें ऐसे बंट गए, कि वे भिन्न भिन्न भाषाओं, कुलों, और जातियोंके अनुसार अलग अलग हो गए।। 6 फिर हाम के पुत्र : कूश, और मिस्र, और फूत और कनान हुए। 7 और कूश के पुत्र सबा, हवीला, सबता, रामा, और सबूतका हुए : और रामा के पुत्र शबा और ददान हुए। 8 और कूश के वंश में निम्रोद भी हुआ; पृय्वी पर पहिला वीर वही हुआ है। 9 वही यहोवा की दृष्टि में पराक्रमी शिकार खेलनेवाला ठहरा, इस से यह कहावत चक्की है; कि निम्रोद के समान यहोवा की दृष्टि में पराक्रमी शिकार खेलनेवाला। 10 और उसके राज्य का आरम्भ शिनार देश में बाबुल, अक्कद, और कलने हुआ। 11 उस देश से वह निकलकर अश्शूर्‌ को गया, और नीनवे, रहोबोतीर, और कालह को, 12 और नीनवे और कालह के बीच रेसेन है, उसे भी बसाया, बड़ा नगर यही है। 13 और मिस्र के वंश में लूदी, अनामी, लहाबी, नप्तूही, 14 और पत्रुसी, कसलूही, और कप्तोरी लोग हुए, कसलूहियोंमे से तो पलिश्ती लोग निकले।। 15 फिर कनान के वंश में उसका ज्थेष्ठ सीदोन, तब हित्त, 16 और यबूसी, एमोरी, गिर्गाशी, 17 हिव्वी, अर्की, सीनी, 18 अर्वदी, समारी, और हमाती लोग भी हुए : फिर कनानियोंके कुल भी फैल गए। 19 और कनानियोंका सिवाना सीदोन से लेकर गरार के मार्ग से होकर अज्जा तक और फिर सदोम और अमोरा और अदमा और सबोयीम के मार्ग से होकर लाशा तक हुआ। 20 हाम के वंश में थे ही हुए; और थे भिन्न भिन्न कुलों, भाषाओं, देशों, और जातियोंके अनुसार अलग अलग हो गए।। 21 फिर शेम, जो सब एबेरवंशियोंका मूलपुरूष हुआ, और जो थेपेत का ज्थेष्ठ भाई या, उसके भी पुत्र उत्पन्न हुए। 22 शेम के पुत्र : एलाम, अश्शूर्‌, अर्पझद्‌, लूद और आराम हुए। 23 और आराम के पुत्र : ऊस, हूल, गेतेर और मश हुए। 24 और अर्पझद्‌ ने शेलह को, और शेलह ने एबेर को जन्म दिया। 25 और एबेर के दो पुत्र उत्पन्न हुए, एक का नाम पेलेग इस कारण रखा गया कि उसके दिनोंमें पृय्वी बंट गई, और उसके भाई का नाम योक्तान है। 26 और योक्तान ने अल्मोदाद, शेलेप, हसर्मावेत, थेरह, 27 यदोरवाम, ऊजाल, दिक्ला, 28 ओबाल, अबीमाएल, शबा, 29 ओपीर, हवीला, और योबाब को जन्म दिया : थे ही सब योक्तान के पुत्र हुए। 30 इनके रहने का स्यान मेशा से लेकर सपारा जो पूर्व में एक पहाड़ है, उसके मार्ग तक हुआ। 31 शेम के पुत्र थे ही हुए; और थे भिन्न भिन्न कुलों, भाषाओं, देशोंऔर जातियोंके अनुसार अलग अलग हो गए।। 32 नूह के पुत्रोंके घराने थे ही हैं : और उनकी जातियोंके अनुसार उनकी वंशावलियां थे ही हैं; और जलप्रलय के पश्चात्‌ पृय्वी भर की जातियां इन्हीं में से होकर बंट गई।। उत्पत्ति 11 1 सारी पृय्वी पर एक ही भाषा, और एक ही बोली यी। 2 उस समय लोग पूर्व की और चलते चलते शिनार देश में एक मैदान पाकर उस में बस गए। 3 तब वे आपस में कहने लगे, कि आओ; हम ईंटें बना बना के भली भंाति आग में पकाएं, और उन्होंने पत्यर के स्यान में ईंट से, और चूने के स्यान में मिट्टी के गारे से काम लिया। 4 फिर उन्होंने कहा, आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बात करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें ऐसा न हो कि हम को सारी पृय्वी पर फैलना पके। 5 जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे; तब इन्हें देखने के लिथे यहोवा उतर आया। 6 और यहोवा ने कहा, मैं क्या देखता हूं, कि सब एक ही दल के हैं और भाषा भी उन सब की एक ही है, और उन्होंने ऐसा ही काम भी आरम्भ किया; और अब जितना वे करने का यत्न करेंगे, उस में से कुछ उनके लिथे अनहोना न होगा। 7 इसलिथे आओ, हम उतर के उनकी भाषा में बड़ी गड़बड़ी डालें, कि वे एक दूसरे की बोली को न समझ सकें। 8 इस प्रकार यहोवा ने उनको, वहां से सारी पृय्वी के ऊपर फैला दिया; और उन्होंने उस नगर का बनाना छोड़ दिया। 9 इस कारण उस नगर को नाम बाबुल पड़ा; क्योंकि सारी पृय्वी की भाषा में जो गड़बड़ी है, सो यहोवा ने वहीं डाली, और वहीं से यहोवा ने मनुष्योंको सारी पृय्वी के ऊपर फैला दिया।। 10 शेम की वंशावली यह है। जल प्रलय के दो वर्ष पश्चात्‌ जब शेम एक सौ वर्ष का हुआ, तब उस ने अर्पझद्‌ को जन्म दिया। 11 और अर्पझद्‌ ने जन्म के पश्चात्‌ शेम पांच सौ वर्ष जीवित रहा; और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 12 जब अर्पझद्‌ पैंतीस वर्ष का हुआ, तब उस ने शेलह को जन्म दिया। 13 और शेलह के जन्म के पश्चात्‌ अर्पझद्‌ चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 14 जब शेलह तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा एबेर को जन्म हुआ। 15 और एबेर के जन्म के पश्चात्‌ शेलह चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 16 जब एबेर चौंतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा पेलेग का जन्म हुआ। 17 और पेलेग के जन्म के पश्चात्‌ एबेर चार सौ तीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 18 जब पेलेग तीस वर्ष को हुआ, तब उसके द्वारा रू का जन्म हुआ। 19 और रू के जन्म के पश्चात्‌ पेलेग दो सौ नौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 20 जब रू बत्तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा सरूग का जन्म हुआ। 21 और सरूग के जन्म के पश्चात्‌ रू दो सौ सात वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 22 जब सरूग तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा नाहोर का जन्म हुआ। 23 और नाहोर के जन्म के पश्चात्‌ सरूग दो सौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 24 जब नाहोर उनतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा तेरह का जन्म हुआ। 25 और तेरह के जन्म के पश्चात्‌ नाहोर एक सौ उन्नीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 26 जब तक तेरह सत्तर वर्ष का हुआ, तब तक उसके द्वारा अब्राम, और नाहोर, और हारान उत्पन्न हुए।। 27 तेरह की यह वंशावली है। तेरह ने अब्राम, और नाहोर, और हारान को जन्म दिया; और हारान ने लूत को जन्म दिया। 28 और हारान अपके पिता के साम्हने ही, कस्‌दियोंके ऊर नाम नगर में, जो उसकी जन्मभूमि यी, मर गया। 29 अब्राम और नाहोर ने स्त्रियां ब्याह लीं : अब्राम की पत्नी का नाम तो सारै, और नाहोर की पत्नी का नाम मिल्का या, यह उस हारान की बेटी यी, जो मिल्का और यिस्का दोनोंका पिता या। 30 सारै तो बांफ यी; उसके संतान न हुई। 31 और तेरह अपना पुत्र अब्राम, और अपना पोता लूत जो हारान का पुत्र या, और अपक्की बहू सारै, जो उसके पुत्र अब्राम की पत्नी यी इन सभोंको लेकर कस्‌दियोंके ऊर नगर से निकल कनान देश जाने को चला; पर हारान नाम देश में पहुचकर वहीं रहने लगा। 32 जब तेरह दो सौ पांच वर्ष का हुआ, तब वह हारान देश में मर गया।। उत्पत्ति 12 1 यहोवा ने अब्राम से कहा, अपके देश, और अपक्की जन्मभूमि, और अपके पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा। 2 और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा। 3 और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूंगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूंगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे। 4 यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राम चला; और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का या। 5 सो अब्राम अपक्की पत्नी सारै, और अपके भतीजे लूत को, और जो धन उन्होंने इकट्ठा किया या, और जो प्राणी उन्होंने हारान में प्राप्त किए थे, सब को लेकर कनान देश में जाने को निकल चला; और वे कनान देश में आ भी गए। 6 उस देश के बीच से जाते हुए अब्राम शकेम में, जहां मोरे का बांज वृझ है, पंहुचा; उस समय उस देश में कनानी लोग रहते थे। 7 तब यहोवा ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, यह देश मैं तेरे वंश को दूंगा : और उस ने वहां यहोवा के लिथे जिस ने उसे दर्शन दिया या, एक वेदी बनाई। 8 फिर वहां से कूच करके, वह उस पहाड़ पर आया, जो बेतेल के पूर्व की ओर है; और अपना तम्बू उस स्यान में खड़ा किया जिसकी पच्छिम की ओर तो बेतेल, और पूर्व की ओर ऐ है; और वहां भी उस ने यहोवा के लिथे एक वेदी बनाई : और यहोवा से प्रार्यना की 9 और अब्राम कूच करके दक्खिन देश की ओर चला गया।। 10 और उस देश में अकाल पड़ा : और अब्राम मिस्र देश को चला गया कि वहां परदेशी होकर रहे -- क्योंकि देश में भयंकर अकाल पड़ा या। 11 फिर ऐसा हुआ कि मिस्र के निकट पहुंचकर, उस ने अपक्की पत्नी सारै से कहा, सुन, मुझे मालूम है, कि तू एक सुन्दर स्त्री है : 12 इस कारण जब मिस्री तुझे देखेंगे, तब कहेंगे, यह उसकी पत्नी है, सो वे मुझ को तो मार डालेंगे, पर तुझ को जीती रख लेंगे। 13 सो यह कहना, कि मैं उसकी बहिन हूं; जिस से तेरे कारण मेरा कल्याण हो और मेरा प्राण तेरे कारण बचे। 14 फिर ऐसा हुआ कि जब अब्राम मिस्र में आया, तब मिस्रियोंने उसकी पत्नी को देखा कि यह अति सुन्दर है। 15 और फिरौन के हाकिमोंने उसको देखकर फिरौन के साम्हने उसकी प्रशंसा की : सो वह स्त्री फिरौन के घर में रखी गई। 16 और उस ने उसके कारण अब्राम की भलाई की; सो उसको भेड़-बकरी, गाय-बैल, दास-दासियां, गदहे-गदहियां, और ऊंट मिले। 17 तब यहोवा ने फिरौन और उसके घराने पर, अब्राम की पत्नी सारै के कारण बड़ी बड़ी विपत्तियां डालीं। 18 सो फिरौन ने अब्राम को बुलवाकर कहा, तू ने मुझ से क्या किया है ? तू ने मुझे क्योंनहीं बताया कि वह तेरी पत्नी है ? 19 तू ने क्योंकहा, कि वह तेरी बहिन है ? मैं ने उसे अपक्की ही पत्नी बनाने के लिथे लिया; परन्तु अब अपक्की पत्नी को लेकर यहां से चला जा। 20 और फिरौन ने अपके आदमियोंको उसके विषय में आज्ञा दी और उन्होंने उसको और उसकी पत्नी को, सब सम्पत्ति समेत जो उसका या, विदा कर दिया।। उत्पत्ति 13 1 तब अब्राम अपक्की पत्नी, और अपक्की सारी सम्पत्ति लेकर, लूत को भी संग लिथे हुए, मिस्र को छोड़कर कनान के दक्खिन देश में आया। 2 अब्राम भेड़-बकरी, गाय-बैल, और सोने-रूपे का बड़ा धनी या। 3 फिर वह दक्खिन देश से चलकर, बेतेल के पास उसी स्यान को पहुंचा, जहां उसका तम्बू पहले पड़ा या, जो बेतेल और ऐ के बीच में है। 4 यह स्यान उस वेदी का है, जिसे उस ने पहले बनाई यी, और वहां अब्राम ने फिर यहोवा से प्रार्यना की। 5 और लूत के पास भी, जो अब्राम के साय चलता या, भेड़-बकरी, गाय-बैल, और तम्बू थे। 6 सो उस देश में उन दोनोंकी समाई न हो सकी कि वे इकट्ठे रहें : क्योंकि उनके पास बहुत धन या इसलिथे वे इकट्ठे न रह सके। 7 सो अब्राम, और लूत की भेड़-बकरी, और गाय-बैल के चरवाहोंके बीच में फगड़ा हुआ : और उस समय कनानी, और परिज्जी लोग, उस देश में रहते थे। 8 तब अब्राम लूत से कहने लगा, मेरे और तेरे बीच, और मेरे और तेरे चरवाहोंके बीच में फगड़ा न होने पाए; क्योंकि हम लोग भाई बन्धु हैं। 9 क्या सारा देश तेरे साम्हने नहीं? सो मुझ से अलग हो, यदि तू बाईं ओर जाए तो मैं दहिनी ओर जाऊंगा; और यदि तू दहिनी ओर जाए तो मैं बाईं ओर जाऊंगा। 10 तब लूत ने आंख उठाकर, यरदन नदी के पास वाली सारी तराई को देखा, कि वह सब सिंची हुई है। 11 जब तक यहोवा ने सदोम और अमोरा को नाश न किया या, तब तक सोअर के मार्ग तक वह तराई यहोवा की बाटिका, और मिस्र देश के समान उपजाऊ यी। 12 अब्राम तो कनान देश में रहा, पर लूत उस तराई के नगरोंमें रहने लगा; और अपना तम्बू सदोम के निकट खड़ा किया। 13 सदोम के लोग यहोवा के लेखे में बड़े दुष्ट और पापी थे। 14 जब लूत अब्राम से अलग हो गया तब उसके पश्चात्‌ यहोवा ने अब्राम से कहा, आंख उठाकर जिस स्यान पर तू है वहां से उत्तर-दक्खिन, पूर्व-पश्चिम, चारोंओर दृष्टि कर। 15 क्योंकि जितनी भूमि तुझे दिखाई देती है, उस सब को मैं तुझे और तेरे वंश को युग युग के लिथे दूंगा। 16 और मैं तेरे वंश को पृय्वी की धूल के किनकोंकी नाई बहुत करूंगा, यहां तक कि जो कोई पृय्वी की धूल के किनकोंको गिन सकेगा वही तेरा वंश भी गिन सकेगा। 17 उठ, इस देश की लम्बाई और चौड़ाई में चल फिर; क्योंकि मैं उसे तुझी को दूंगा। 18 इसके पशचात्‌ अब्राम अपना तम्बू उखाड़कर, मम्रे के बांजोंके बीच जो हेब्रोन में थे जाकर रहने लगा, और वहां भी यहोवा की एक वेदी बनाई।। उत्पत्ति 14 1 शिनार के राजा अम्रापेल, और एल्लासार के राजा अर्योक, और एलाम के राजा कदोर्लाओमेर, और गोयीम के राजा तिदाल के दिनोंमें ऐसा हुआ, 2 कि उन्होंने सदोम के राजा बेरा, और अमोरा के राजा बिर्शा, और अदमा के राजा शिनाब, और सबोयीम के राजा शेमेबेर, और बेला जो सोअर भी कहलाता है, इन राजाओं के विरूद्ध युद्ध किया। 3 इन पांचोंने सिद्दीम नाम तराई में, जो खारे ताल के पास है, एका किया। 4 बारह वर्ष तक तो थे कदोर्लाओमेर के अधीन रहे; पर तेरहवें वर्ष में उसके विरूद्ध उठे। 5 सो चौदहवें वर्ष में कदोर्लाओमेर, और उसके संगी राजा आए, और अशतरोत्कनम में रपाइयोंको, और हाम में जूजियोंको, और शबेकिर्यातैम में एमियोंको, 6 और सेईर नाम पहाड़ में होरियोंको, मारते मारते उस एल्पारान तक जो जंगल के पास है पहुंच गए। 7 वहां से वे लौटकर एन्मिशपात को आए, जो कादेश भी कहलाता है, और अमालेकियोंके सारे देश को, और उन एमोरियोंको भी जीत लिया, जो हससोन्तामार में रहते थे। 8 तब सदोम, अमोरा, अदमा, सबोयीम, और बेला, जो सोअर भी कहलाता है, इनके राजा निकले, और सिद्दीम नाम तराई। में, उनके साय युद्ध के लिथे पांति बान्धी। 9 अर्यात्‌ एलाम के राजा कदोर्लाओमेर, गोयीम के राजा तिदाल, शिनार के राजा अम्रापेल, और एल्लासार के राजा अर्योक, इन चारोंके विरूद्ध उन पांचोंने पांति बान्धी। 10 सिद्दीम नाम तराई में जहां लसार मिट्टी के गड़हे ही गड़हे थे; सदोम और अमोरा के राजा भागते भागते उन में गिर पके, और जो बचे वे पहाड़ पर भाग गए। 11 तब वे सदोम और अमोरा के सारे धन और भोजन वस्तुओं को लूट लाट कर चले गए। 12 और अब्राम का भतीजा लूत, जो सदोम में रहता या; उसको भी धन समेत वे लेकर चले गए। 13 तब एक जन जो भागकर बच निकला या उस ने जाकर इब्री अब्राम को समाचार दिया; अब्राम तो एमोरी मम्रे, जो एश्कोल और आनेर का भाई या, उसके बांज वृझोंके बीच में रहता या; और थे लोग अब्राम के संग वाचा बान्धे हुए थे। 14 यह सुनकर कि उसका भतीजा बन्धुआई में गया है, अब्राम ने अपके तीन सौ अठारह शिझित, युद्ध कौशल में निपुण दासोंको लेकर जो उसके कुटुम्ब में उत्पन्न हुए थे, अस्त्र शस्त्र धारण करके दान तक उनका पीछा किया। 15 और अपके दासोंके अलग अलग दल बान्धकर रात को उन पर चढ़ाई करके उनको मार लिया और होबा तक, जो दमिश्क की उत्तर ओर है, उनका पीछा किया। 16 और सारे धन को, और अपके भतीजे लूत, और उसके धन को, और स्त्रियोंको, और सब बन्धुओं को, लौटा ले आया। 17 जब वह कदोर्लाओमेर और उसके सायी राजाओं को जीतकर लौटा आता या तब सदोम का राजा शावे नाम तराई में, जो राजा की भी कहलाती है, उस से भेंट करने के लिथे आया। 18 जब शालेम का राजा मेल्कीसेदेक, जो परमप्रधान ईश्वर का याजक या, रोटी और दाखमधु ले आया। 19 और उस ने अब्राम को यह आशीर्वाद दिया, कि परमप्रधान ईश्वर की ओर से, जो आकाश और पृय्वी का अधिक्कारनेी है, तू धन्य हो। 20 और धन्य है परमप्रधान ईश्वर, जिस ने तेरे द्रोहियोंको तेरे वश में कर दिया है। तब अब्राम ने उसको सब का दशमांश दिया। 21 जब सदोम के राजा ने अब्राम से कहा, प्राणियोंको तो मुझे दे, और धन को अपके पास रख। 22 अब्राम ने सदोम के राजा ने कहा, परमप्रधान ईश्वर यहोवा, जो आकाश और पृय्वी का अधिक्कारनेी है, 23 उसकी मैं यह शपय खाता हूं, कि जो कुछ तेरा है उस में से न तो मै एक सूत, और न जूती का बन्धन, न कोई और वस्तु लूंगा; कि तू ऐसा न कहने पाए, कि अब्राम मेरे ही कारण धनी हुआ। 24 पर जो कुछ इन जवानोंने खा लिया है और उनका भाग जो मेरे साय गए थे; अर्यात्‌ आनेर, एश्कोल, और मम्रे मैं नहीं लौटाऊंगा वे तो अपना अपना भाग रख लें।। उत्पत्ति 15 1 इन बातोंके पश्चात्‌ यहोवा को यह वचन दर्शन में अब्राम के पास पहुंचा, कि हे अब्राम, मत डर; तेरी ढाल और तेरा अत्यन्त बड़ा फल मैं हूं। 2 अब्राम ने कहा, हे प्रभु यहोवा मैं तो निर्वंश हूं, और मेरे घर का वारिस यह दमिश्की एलीएजेर होगा, सो तू मुझे क्या देगा ? 3 और अब्राम ने कहा, मुझे तो तू ने वंश नहीं दिया, और क्या देखता हूं, कि मेरे घर में उत्पन्न हुआ एक जन मेरा वारिस होगा। 4 तब यहोवा का यह वचन उसके पास पहुंचा, कि यह तेरा वारिस न होगा, तेरा जो निज पुत्र होगा, वही तेरा वारिस होगा। 5 और उस ने उसको बाहर ले जाके कहा, आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है ? फिर उस ने उस से कहा, तेरा वंश ऐसा ही होगा। 6 उस ने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। 7 और उस ने उस से कहा मैं वही यहोवा हूं जो तुझे कस्‌दियोंके ऊर नगर से बाहर ले आया, कि तुझ को इस देश का अधिक्कारने दूं। 8 उस ने कहा, हे प्रभु यहोवा मैं कैसे जानूं कि मैं इसका अधिक्कारनेी हूंगा ? 9 यहोवा ने उस से कहा, मेरे लिथे तीन वर्ष की एक कलोर, और तीन वर्ष की एक बकरी, और तीन वर्ष का एक मेंढ़ा, और एक पिण्डुक और कबूतर का एक बच्चा ले। 10 और इन सभोंको लेकर, उस ने बीच में से दो टुकड़े कर दिया, और टुकड़ोंको आम्हने-साम्हने रखा : पर चिडिय़ाओं को उस ने टुकड़े न किया। 11 और जब मांसाहारी पक्की लोयोंपर फपके, तब अब्राम ने उन्हें उड़ा दिया। 12 जब सूर्य अस्त होने लगा, तब अब्राम को भारी नींद आई; और देखो, अत्यन्त भय और अन्धकार ने उसे छा लिया। 13 तब यहोवा ने अब्राम से कहा, यह निश्चय जान कि तेरे वंश पराए देश में परदेशी होकर रहेंगे, और उसके देश के लोगोंके दास हो जाएंगे; और वे उनको चार सौ वर्ष लोंदु:ख देंगे; 14 फिर जिस देश के वे दास होंगे उसको मैं दण्ड दूंगा : और उसके पश्चात्‌ वे बड़ा धन वहां से लेकर निकल आएंगे। 15 तू तो अपके पितरोंमें कुशल के साय मिल जाएगा; तुझे पूरे बुढ़ापे में मिट्टी दी जाएगी। 16 पर वे चौयी पीढ़ी में यहां फिर आएंगे : क्योंकि अब तक एमोरियोंका अधर्म पूरा नहीं हुआ। 17 और ऐसा हुआ कि जब सूर्य अस्त हो गया और घोर अन्धकार छा गया, तब एक अंगेठी जिस में से धुआं उठता या और एक जलता हुआ पक्कीता देख पड़ा जो उन टुकड़ोंके बीच में से होकर निकल गया। 18 उसी दिन यहोवा ने अब्राम के साय यह वाचा बान्धी, कि मिस्र के महानद से लेकर परात नाम बड़े नद तक जितना देश है, 19 अर्यात्‌, केनियों, कनिज्जियों, कद्क़ोनियों, 20 हित्तियों, पक्कीज्जियों, रपाइयों, 21 एमोरियों, कनानियों, गिर्गाशियोंऔर यबूसियोंका देश मैं ने तेरे वंश को दिया है।। उत्पत्ति 16 1 अब्राम की पत्नी सारै के कोई सन्तान न यी : और उसके हाजिरा नाम की एक मिस्री लौंडी यी। 2 सो सारै ने अब्राम से कहा, देख, यहोवा ने तो मेरी कोख बन्द कर रखी है सो मैं तुझ से बिनती करती हूं कि तू मेरी लौंडी के पास जा : सम्भव है कि मेरा घर उसके द्वारा बस जाए। 3 सो सारै की यह बात अब्राम ने मान ली। सो जब अब्राम को कनान देश में रहते दस वर्ष बीत चुके तब उसकी स्त्री सारै ने अपक्की मिस्री लौंडी हाजिरा को लेकर अपके पति अब्राम को दिया, कि वह उसकी पत्नी हो। 4 और वह हाजिरा के पास गया, और वह गर्भवती हुई और जब उस ने जाना कि वह गर्भवती है तब वह अपक्की स्वामिनी को अपक्की दृष्टि में तुच्छ समझने लगी। 5 तब सारै ने अब्राम से कहा, जो मुझ पर उपद्रव हुआ सो तेरे ही सिर पर हो : मैं ने तो अपक्की लौंडी को तेरी पत्नी कर दिया; पर जब उस ने जाना कि वह गर्भवती है, तब वह मुझे तुच्छ समझने लगी, सो यहोवा मेरे और तेरे बीच में न्याय करे। 6 अब्राम ने सारै से कहा, देख तेरी लौंडी तेरे वश में है : जैसा तुझे भला लगे वैसा ही उसके साय कर। सो सारै उसको दु:ख देने लगी और वह उसके साम्हने से भाग गई। 7 तब यहोवा के दूत ने उसके जंगल में शूर के मार्ग पर जल के एक सोते के पास पाकर कहा, 8 हे सारै की लौंडी हाजिरा, तू कहां से आती और कहां को जाती है ? उस ने कहा, मैं अपक्की स्वामिनी सारै के साम्हने से भग आई हूं। 9 यहोवा के दूत ने उस से कहा, अपक्की स्वामिनी के पास लौट जा और उसके वश में रह। 10 और यहोवा के दूत ने उस से कहा, मैं तेरे वंश को बहुत बढ़ाऊंगा, यहां तक कि बहुतायत के कारण उसकी गणना न हो सकेगी। 11 और यहोवा के दूत ने उस से कहा, देख तू गर्भवती है, और पुत्र जनेगी, सो उसका नाम इश्माएल रखना; क्योंकि यहोवा ने तेरे दु:ख का हाल सुन लिया है। 12 और वह मनुष्य बनैले गदहे के समान होगा उसका हाथ सबके विरूद्ध उठेगा, और सब के हाथ उसके विरूद्ध उठेंगे; और वह अपके सब भाई बन्धुओं के मध्य में बसा रहेगा। 13 तब उस ने यहोवा का नाम जिस ने उस से बातें की यीं, अत्ताएलरोई रखकर कहा कि, कया मैं यहां भी उसको जाते हुए देखने पाई जो मेरा देखनेहारा है ? 14 इस कारण उस कुएं का नाम लहैरोई कुआं पड़ा; वह तो कादेश और बेरेद के बीच में है। 15 सो हाजिरा अब्राम के द्वारा एक पुत्र जनी : और अब्राम ने अपके पुत्र का नाम, जिसे हाजिरा जनी, इश्माएल रखा। 16 जब हाजिरा ने अब्राम के द्वारा इश्माएल को जन्म दिया उस समय अब्राम छियासी वर्ष का या। उत्पत्ति 17 1 जब अब्राम निन्नानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर हूं; मेरी उपस्यिति में चल और सिद्ध होता जा। 2 और मैं तेरे साय वाचा बान्धूंगा, और तेरे वंश को अत्यन्त ही बढ़ाऊंगा, और तेरे वंश को अत्यन्त ही बढ़ाऊंगा। 3 तब अब्राम मुंह के बल गिरा : और परमेश्वर उस से योंबातें कहता गया, 4 देख, मेरी वाचा तेरे साय बन्धी रहेगी, इसलिथे तू जातियोंके समूह का मूलपिता हो जाएगा। 5 सो अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा परन्तु तेरा नाम इब्राहीम होगा क्योंकि मैं ने तुझे जातियोंके समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। 6 और मैं तुझे अत्यन्त ही फुलाऊं फलाऊंगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूंगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे। 7 और मैं तेरे साय, और तेरे पश्चात्‌ पीढ़ी पीढ़ी तक तेरे वंश के साय भी इस आशय की युग युग की वाचा बान्धता हूं, कि मैं तेरा और तेरे पश्चात्‌ तेरे वंश का भी परमेश्वर रहूंगा। 8 और मैं तुझ को, और तेरे पश्चात्‌ तेरे वंश को भी, यह सारा कनान देश, जिस में तू परदेशी होकर रहता है, इस रीति दूंगा कि वह युग युग उनकी निज भूमि रहेगी, और मैं उनका परमेश्वर रहूंगा। 9 फिर परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, तू भी मेरे साय बान्धी हुई वाचा का पालन करना; तू और तेरे पश्चात्‌ तेरा वंश भी अपक्की अपक्की पीढ़ी में उसका पालन करे। 10 मेरे साय बान्धी हुई वाचा, जो तुझे और तेरे पश्चात्‌ तेरे वंश को पालनी पकेगी, सो यह है, कि तुम में से एक एक पुरूष का खतना हो। 11 तुम अपक्की अपक्की खलड़ी का खतना करा लेना; जो वाचा मेरे और तुम्हारे बीच में है, उसका यही चिन्ह होगा। 12 पीढ़ी पीढ़ी में केवल तेरे वंश ही के लोग नहीं पर जो तेरे घर में उत्पन्न हों, वा परदेशियोंको रूपा देकर मोल लिथे जाएं, ऐसे सब पुरूष भी जब आठ दिन के होंजाएं, तब उनका खतना किया जाए। 13 जो तेरे घर में उत्पन्न हो, अयवा तेरे रूपे से मोल लिया जाए, उसका खतना अवश्य ही किया जाए; सो मेरी वाचा जिसका चिन्ह तुम्हारी देह में होगा वह युग युग रहेगी। 14 जो पुरूष खतनारहित रहे, अर्यात्‌ जिसकी खलड़ी का खतना न हो, वह प्राणी अपके लोगोंमे से नाश किया जाए, क्योंकि उस ने मेरे साय बान्धी हुई वाचा को तोड़ दिया।। 15 फिर परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। 16 और मैं उसको आशीष दूंगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूंगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूंगा, कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य राज्य के राजा उत्पन्न होंगे। 17 तब इब्राहीम मुंह के बल गिर पड़ा और हंसा, और अपके मन ही मन कहने लगा, क्या सौ वर्ष के पुरूष के भी सन्तान होगा और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी ? 18 और इब्राहीम ने परमेश्वर से कहा, इश्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे! यही बहुत है। 19 तब परमेश्वर ने कहा, निश्चय तेरी पत्नी सारा के तुझ से एक पुत्र उत्पन्न होगा; और तू उसका नाम इसहाक रखना : और मैं उसके साय ऐसी वाचा बान्धूंगा जो उसके पश्चात्‌ उसके वंश के लिथे युग युग की वाचा होगी। 20 और इश्माएल के विषय में भी मै ने तेरी सुनी है : मैं उसको भी आशीष दूंगा, और उसे फुलाऊं फलाऊंगा और अत्यन्त ही बढ़ा दूंगा; उस से बारह प्रधान उत्पन्न होंगे, और मैं उस से एक बड़ी जाति बनाऊंगा। 21 परन्तु मैं अपक्की वाचा इसहाक ही के साय बान्धूंगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्त समय में उत्पन्न होगा। 22 तब परमेश्वर ने इब्राहीम से बातें करनी बन्द कीं और उसके पास से ऊपर चढ़ गया। 23 तब इब्राहीम ने अपके पुत्र इश्माएल को, उसके घर में जितने उत्पन्न हुए थे, और जितने उसके रूपके से मोल लिथे गए थे, निदान उसके घर में जितने पुरूष थे, उन सभोंको लेके उसी दिन परमेश्वर के वचन के अनुसार उनकी खलड़ी का खतना किया। 24 जब इब्राहीम की खलड़ी का खतना हुआ तब वह निन्नानवे वर्ष का या। 25 और जब उसके पुत्र इश्माएल की खलड़ी का खतना हुआ तब वह तेरह वर्ष का या। 26 इब्राहीम और उसके पुत्र इश्माएल दोनोंका खतना एक ही दिन हुआ। 27 और उसके घर में जितने पुरूष थे जो घर में उत्पन्न हुए, तया जो परदेशियोंके हाथ से मोल लिथे गए थे, सब का खतना उसके साय ही हुआ।। उत्पत्ति 18 1 इब्राहीम मम्रे के बांजो के बीच कड़ी धूप के समय तम्बू के द्वार पर बैठा हुआ या, तब यहोवा ने उसे दर्शन दिया : 2 और उस ने आंख उठाकर दृष्टि की तो क्या देखा, कि तीन पुरूष उसके साम्हने खड़े हैं : जब उस ने उन्हे देखा तब वह उन से भेंट करने के लिथे तम्बू के द्वार से दौड़ा, और भूमि पर गिरकर दण्डवत्‌ की और कहने लगा, 3 हे प्रभु, यदि मुझ पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि है तो मैं बिनती करता हूं, कि अपके दास के पास से चले न जाना। 4 मैं योड़ा सा जल लाता हूं और आप अपके पांव धोकर इस वृझ के तले विश्रम करें। 5 फिर मैं एक टुकड़ा रोटी ले आऊं और उस से आप अपके जीव को तृप्त करें; तब उसके पश्चात्‌ आगे बढें : क्योंकि आप अपके दास के पास इसी लिथे पधारे हैं। उन्होंने कहा, जैसा तू कहता है वैसा ही कर। 6 सो इब्राहीम ने तम्बू में सारा के पास फुर्ती से जाकर कहा, तीन सआ मैदा फुर्ती से गून्ध, और फुलके बना। 7 फिर इब्राहीम गाय बैल के फुण्ड में दौड़ा, और एक कोमल और अच्छा बछड़ा लेकर अपके सेवक को दिया, और उसने फुर्ती से उसको पकाया। 8 तब उस ने मक्खन, और दूध, और वह बछड़ा, जो उस ने पकवाया या, लेकर उनके आगे परोस दिया; और आप वृझ के तले उनके पास खड़ा रहा, और वे खाने लगे। 9 उन्होंने उस से पूछा, तेरी पत्नी सारा कहां है? उस ने कहा, वह तो तम्बू में है। 10 उस ने कहा मैं वसन्त ऋतु में निश्चय तेरे पास फिर आऊंगा; और तब तेरी पत्नी सारा के एक पुत्र उत्पन्न होगा। और सारा तम्बू के द्वार पर जो इब्राहीम के पीछे या सुन रही यी। 11 इब्राहीम और सारा दोनो बहुत बूढ़े थे; और सारा का स्त्रीधर्म बन्द हो गया या 12 सो सारा मन में हंस कर कहने लगी, मैं तो बूढ़ी हूं, और मेरा पति भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा? 13 तब यहोवा ने इब्राहीम से कहा, सारा यह कहकर कयोंहंसी, कि क्या मेरे, जो ऐसी बुढिय़ा हो गई हूं, सचमुच एक पुत्र उत्पन्न होगा? 14 क्या यहोवा के लिथे कोई काम कठिन है? नियत समय में, अर्यात्‌ वसन्त ऋतु में, मैं तेरे पास फिर आऊंगा, और सारा के पुत्र उत्पन्न होगा। 15 तब सारा डर के मारे यह कहकर मुकर गई, कि मैं नहीं हंसी। उस ने कहा, नहीं; तू हंसी तो यी।। 16 फिर वे पुरूष वहां से चलकर, सदोम की ओर ताकने लगे : और इब्राहीम उन्हें विदा करने के लिथे उनके संग संग चला। 17 तब यहोवा ने कहा, यह जो मैं करता हूं सो क्या इब्राहीम से छिपा रखूं ? 18 इब्राहीम से तो निश्चय एक बड़ी और सामर्यी जाति उपकेगी, और पृय्वी की सारी जातियां उसके द्वारा आशीष पाएंगी। 19 क्योंकि मैं जानता हूं, कि वह अपके पुत्रोंऔर परिवार को जो उसके पीछे रह जाएंगे आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें, इसलिथे कि जो कुछ यहोवा ने इब्राहीम के विषय में कहा है उसे पूरा करे। 20 क्योंकि मैं जानता हूं, कि वह अपके पुत्रोंऔर परिवार को जो उसके पीछे रह जाएंगे आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें, इसलिथे कि जो कुछ यहोवा ने इब्राहीम के विषय में कहा है उसे पूरा करे। 21 इसलिथे मैं उतरकर देखूंगा, कि उसकी जैसी चिल्लाहट मेरे कान तक पहुंची है, उन्होंने ठीक वैसा ही काम किया है कि नहीं : और न किया हो तो मैं उसे जान लूंगा। 22 सो वे पुरूष वहां से मुड़ के सदोम की ओर जाने लगे : पर इब्राहीम यहोवा के आगे खड़ा रह गया। 23 तब इब्राहीम उसके समीप जाकर कहने लगा, क्या सचमुच दुष्ट के संग धर्मी को भी नाश करेगा ? 24 कदाचित्‌ उस नगर में पचास धर्मी हों: तो क्या तू सचमुच उस स्यान को नाश करेगा और उन पचास धमिर्योंके कारण जो उस में हो न छोड़ेगा ? 25 इस प्रकार का काम करना तुझ से दूर रहे कि दुष्ट के संग धर्मी को भी मार डाले और धर्मी और दुष्ट दोनोंकी एक ही दशा हो। 26 यहोवा ने कहा यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्यान को छोडूंगा। 27 फिर इब्राहीम ने कहा, हे प्रभु, सुन मैं तो मिट्टी और राख हूं; तौभी मैं ने इतनी ढिठाई की कि तुझ से बातें करूं। 28 कदाचित्‌ उन पचास धमिर्योंमे पांच घट जाए : तो क्या तू पांच ही के घटने के कारण उस सारे नगर का नाश करेगा ? उस ने कहा, यदि मुझे उस में पैंतालीस भी मिलें, तौभी उसका नाश न करूंगा। 29 फिर उस ने उस से यह भी कहा, कदाचित्‌ वहां चालीस मिलें। उस ने कहा, तो मैं चालीस के कारण भी ऐसा ने करूंगा। 30 फिर उस ने कहा, हे प्रभु, क्रोध न कर, तो मैं कुछ और कहूं : कदाचित्‌ वहां तीस मिलें। उस ने कहा यदि मुझे वहां तीस भी मिलें, तौभी ऐसा न करूंगा। 31 फिर उस ने कहा, हे प्रभु, सुन, मैं ने इतनी ढिठाई तो की है कि तुझ से बातें करूं : कदाचित्‌ उस में बीस मिलें। उस ने कहा, मैं बीस के कारण भी उसका नाश न करूंगा। 32 फिर उस ने कहा, हे प्रभु, क्रोध न कर, मैं एक ही बार और कहूंगा : कदाचित्‌ उस में दस मिलें। उस ने कहा, तो मैं दस के कारण भी उसका नाश न करूंगा। 33 जब यहोवा इब्राहीम से बातें कर चुका, तब चला गया : और इब्राहीम अपके घर को लौट गया।। उत्पत्ति 19 1 सांफ को वे दो दूत सदोम के पास आए : और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा या : सो उनको देखकर वह उन से भेंट करने के लिथे उठा; और मुंह के बल फुककर दण्डवत्‌ कर कहा; 2 हे मेरे प्रभुओं, अपके दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्रम कीजिए, और अपके पांव धोइथे, फिर भोर को उठकर अपके मार्ग पर जाइए। उन्होंने कहा, नहीं; हम चौक ही में रात बिताएंगे। 3 और उस ने उन से बहुत बिनती करके उन्हें मनाया; सो वे उसके साय चलकर उसके घर में आए; और उस ने उनके लिथे जेवनार तैयार की, और बिना खमीर की रोटियां बनाकर उनको खिलाई। 4 उनके सो जाने के पहिले, उस सदोम नगर के पुरूषोंने, जवानोंसे लेकर बूढ़ोंतक, वरन चारोंओर के सब लोगोंने आकर उस घर को घेर लिया; 5 और लूत को पुकारकर कहने लगे, कि जो पुरूष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहां हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ, कि हम उन से भोग करें। 6 तब लूत उनके पास द्वार बाहर गया, और किवाड़ को अपके पीछे बन्द करके कहा, 7 हे मेरे भाइयों, ऐसी बुराई न करो। 8 सुनो, मेरी दो बेटियां हैं जिन्होंने अब तक पुरूष का मुंह नहीं देखा, इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊं, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उन से करो : पर इन पुरूषोंसे कुछ न करो; क्योंकि थे मेरी छत के तले आए हैं। 9 उनहोंने कहा, हट जा। फिर वे कहने लगे, तू एक परदेशी होकर यहां रहने के लिथे आया पर अब न्यायी भी बन बैठा है : सो अब हम उन से भी अधिक तेरे साय बुराई करेंगे। और वे पुरूष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिथे निकट आए। 10 तब उन पाहुनोंने हाथ बढ़ाकर, लूत को अपके पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया। 11 और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरूषोंको जो घर के द्वार पर थे अन्धा कर दिया, सो वे द्वार को टटोलते टटोलते यक गए। 12 फिर उन पाहुनोंने लूत से पूछा, यहां तेरे और कौन कौन हैं? दामाद, बेटे, बेटियां, वा नगर में तेरा जो कोई हो, उन सभोंको लेकर इस स्यान से निकल जा। 13 क्योंकि हम यह स्यान नाश करने पर हैं, इसलिथे कि उसकी चिल्लाहट यहोवा के सम्मुख बढ़ गई है; और यहोवा ने हमें इसका सत्यनाश करने के लिथे भेज दिया है। 14 तब लूत ने निकलकर अपके दामादोंको, जिनके साय उसकी बेटियोंकी सगाई हो गई यी, समझा के कहा, उठो, इस स्यान से निकल चलो : क्योंकि यहोवा इस नगर को नाश किया चाहता है। पर वह अपके दामादोंकी दृष्टि में ठट्ठा करनेहारा सा जान पड़ा। 15 जब पह फटने लगी, तब दूतोंने लूत से फुर्ती कराई और कहा, कि उठ, अपक्की पत्नी और दोनो बेटियोंको जो यहां हैं ले जा : नहीं तो तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाएगा। 16 पर वह विलम्ब करता रहा, इस से उन पुरूषोंने उसका और उसकी पत्नी, और दोनोंबेटियोंको हाथ पकड़ लिया; क्योंकि यहोवा की दया उस पर यी : और उसको निकालकर नगर के बाहर कर दिया। 17 और ऐसा हुआ कि जब उन्होंने उनको बाहर निकाला, तब उस ने कहा अपना प्राण लेकर भाग जा; पीछे की और न ताकना, और तराई भर में न ठहरना; उस पहाड़ पर भाग जाना, नहीं तो तू भी भस्म हो जाएगा। 18 लूत ने उन से कहा, हे प्रभु, ऐसा न कर : 19 देख, तेरे दास पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि हुई है, और तू ने इस में बड़ी कृपा दिखाई, कि मेरे प्राण को बचाया है; पर मैं पहाड़ पर भाग नहीं सकता, कहीं ऐसा न हो, कि कोई विपत्ति मुझ पर आ पके, और मैं मर जाऊं : 20 देख, वह नगर ऐसा निकट है कि मैं वहां भाग सकता हूं, और वह छोटा भी है : मुझे वहीं भाग जाने दे, क्या वह छोटा नहीं हैं? और मेरा प्राण बच जाएगा। 21 उस ने उस से कहा, देख, मैं ने इस विषय में भी तेरी बिनती अंगीकार की है, कि जिस नगर की चर्चा तू ने की है, उसको मैं नाश न करूंगा। 22 फुर्ती से वहां भाग जा; क्योंकि जब तक तू वहां न पहुचे तब तक मैं कुछ न कर सकूंगा। इसी कारण उस नगर का नाम सोअर पड़ा। 23 लूत के सोअर के निकट पहुचते ही सूर्य पृय्वी पर उदय हुआ। 24 तब यहोवा ने अपक्की ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; 25 और उन नगरोंको और सम्पूर्ण तराई को, और नगरोंको और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरोंके सब निवासिक्कों, भूमि की सारी उपज समेत नाश कर दिया। 26 लूत की पत्नी ने जो उसके पीछे यी दृष्टि फेर के पीछे की ओर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई। 27 भोर को इब्राहीम उठकर उस स्यान को गया, जहां वह यहोवा के सम्मुख खड़ा या; 28 और सदोम, और अमोरा, और उस तराई के सारे देश की ओर आंख उठाकर क्या देखा, कि उस देश में से धधकती हुई भट्टी का सा धुआं उठ रहा है। 29 और ऐसा हुआ, कि जब परमेश्वर ने उस तराई के नगरोंको, जिन में लूत रहता या, उलट पुलट कर नाश किया, तब उस ने इब्राहीम को याद करके लूत को उस घटना से बचा लिया। 30 और लूत ने सोअर को छोड़ दिया, और पहाड़ पर अपक्की दोनोंबेटियोंसमेत रहने लगा; क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता या : इसलिथे वह और उसकी दोनोंबेटियां वहां एक गुफा में रहने लगे। 31 तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, हमारा पिता बूढ़ा है, और पृय्वी भर में कोई ऐसा पुरूष नहीं जो संसार की रीति के अनुसार हमारे पास आए : 32 सो आ, हम अपके पिता को दाखमधु पिलाकर, उसके साय सोएं, जिस से कि हम अपके पिता के वंश को बचाए रखें। 33 सो उन्होंने उसी दिन रात के समय अपके पिता को दाखमधु पिलाया, तब बड़ी बेटी जाकर अपके पिता के पास लेट गई; पर उस ने न जाना, कि वह कब लेटी, और कब उठ गई। 34 और ऐसा हुआ कि दूसरे दिन बड़ी ने छोटी से कहा, देख, कल रात को मैं अपके पिता के साय सोई : सो आज भी रात को हम उसको दाखमधु पिलाएं; तब तू जाकर उसके साय सोना कि हम अपके पिता के द्वारा वंश उत्पन्न करें। 35 सो उन्होंने उस दिन भी रात के समय अपके पिता को दाखमधु पिलाया : और छोटी बेटी जाकर उसके पास लौट गई : पर उसको उसके भी सोने और उठने के समय का ज्ञान न या। 36 इस प्रकार से लूत की दोनो बेटियां अपके पिता से गर्भवती हुई। 37 और बड़ी एक पुत्र जनी, और उसका नाम मोआब रखा : वह मोआब नाम जाति का जो आज तक है मूलपिता हुआ। 38 और छोटी भी एक पुत्र जनी, और उसका नाम बेनम्मी रखा; वह अम्मोन्‌ वंशियोंका जो आज तक हैं मूलपिता हुआ।। उत्पत्ति 20 1 फिर इब्राहीम वहां से कूच कर दक्खिन देश में आकर कादेश और शूर के बीच में ठहरा, और गरार में रहने लगा। 2 और इब्राहीम अपक्की पत्नी सारा के विषय में कहने लगा, कि वह मेरी बहिन है : सो गरार के राजा अबीमेलेक ने दूत भेजकर सारा को बुलवा लिया। 3 रात को परमेश्वर ने स्वप्न में अबीमेलेक के पास आकर कहा, सुन, जिस स्त्री को तू ने रख लिया है, उसके कारण तू मर जाएगा, क्योंकि वह सुहागिन है। 4 परन्तु अबीमेलेक उसके पास न गया या : सो उस ने कहा, हे प्रभु, क्या तू निर्दोष जाति का भी घात करेगा ? 5 क्या उसी ने स्वयं मुझ से नहीं कहा, कि वह मेरी बहिन है ? और उस स्त्री ने भी आप कहा, कि वह मेरा भाई है : मैं ने तो अपके मन की खराई और अपके व्यवहार की सच्चाई से यह काम किया। 6 परमेश्वर ने उस से स्वप्न में कहा, हां, मैं भी जानता हूं कि अपके मन की खराई से तू ने यह काम किया है और मैं ने तुझे रोक भी रखा कि तू मेरे विरूद्ध पाप न करे : इसी कारण मैं ने तुझ को उसे छूने नहीं दिया। 7 सो अब उस पुरूष की पत्नी को उसे फेर दे; क्योंकि वह नबी है, और तेरे लिथे प्रार्यना करेगा, और तू जीता रहेगा : पर यदि तू उसको न फेर दे तो जान रख, कि तू, और तेरे जितने लोग हैं, सब निश्चय मर जाएंगे। 8 बिहान को अबीमेलेक ने तड़के उठकर अपके सब कर्मचारियोंको बुलवाकर थे सब बातें सुनाई : और वे लोग बहुत डर गए। 9 तब अबीमेलेक ने इब्राहीम को बुलवाकर कहा, तू ने हम से यह क्या किया है ? और मैं ने तेरा क्या बिगाड़ा या, कि तू ने मेरे और मेरे राज्य के ऊपर ऐसा बड़ा पाप डाल दिया है ? तू ने मुझ से वह काम किया है जो उचित न या। 10 फिर अबीमेलेक ने इब्राहीम से पूछा, तू ने क्या समझकर ऐसा काम किया ? 11 इब्राहीम ने कहा, मैं ने यह सोचा या, कि इस स्यान में परमेश्वर का कुछ भी भय न होगा; सो थे लोग मेरी पत्नी के कारण मेरा घात करेंगे। 12 और फिर भी सचमुच वह मेरी बहिन है, वह मेरे पिता की बेटी तो है पर मेरी माता की बेटी नहीं; फिर वह मेरी पत्नी हो गई। 13 और ऐसा हुआ कि जब परमेश्वर ने मुझे अपके पिता का घर छोड़कर निकलने की आज्ञा दी, तब मैं ने उस से कहा, इतनी कृपा तुझे मुझ पर करनी होगी : कि हम दोनोंजहां जहां जाएं वहां वहां तू मेरे विषय में कहना, कि यह मेरा भाई है। 14 तब अबीमेलेक ने भेड़-बकरी, गाय-बैल, और दास-दासियां लेकर इब्राहीम को दीं, और उसकी पत्नी सारा को भी उसे फेर दिया। 15 और अबीमेलेक ने कहा, देख, मेरा देश तेरे साम्हने है; जहां तुझे भावे वहां रह। 16 और सारा से उस ने कहा, देख, मैं ने तेरे भाई को रूपे के एक हजार टुकड़े दिए हैं : देख, तेरे सारे संगियोंके साम्हने वही तेरी आंखोंका पर्दा बनेगा, और सभोंके साम्हने तू ठीक होगी। 17 तब इब्राहीम ने यहोवा से प्रार्यना की, और यहोवा ने अबीमेलेक, और उसकी पत्नी, और दासिक्कों चंगा किया और वे जनने लगीं। 18 क्योंकि यहोवा ने इब्राहीम की पत्नी सारा के कारण अबीमेलेक के घर की सब स्त्रियोंकी कोखोंको पूरी रीति से बन्द कर दिया या।। उत्पत्ति 21 1 सो यहोवा ने जैसा कहा या वैसा ही सारा की सुधि लेके उसके साय अपके वचन के अनुसार किया। 2 सो सारा को इब्राहीम से गर्भवती होकर उसके बुढ़ापे में उसी नियुक्त समय पर जो परमेश्वर ने उस से ठहराया या एक पुत्र उत्पन्न हुआ। 3 और इब्राहीम ने अपके पुत्र का नाम जो सारा से उत्पन्न हुआ या इसहाक रखा। 4 और जब उसका पुत्र इसहाक आठ दिन का हुआ, तब उस ने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार उसक खतना किया। 5 और जब इब्राहीम का पुत्र इसहाक उत्पन्न हुआ तब वह एक सौ वर्ष का या। 6 और सारा ने कहा, परमेश्वर ने मुझे प्रफुल्लित कर दिया है; इसलिथे सब सुननेवाले भी मेरे साय प्रफुल्लित होंगे। 7 फिर उस ने यह भी कहा, कि क्या कोई कभी इब्राहीम से कह सकता या, कि सारा लड़कोंको दूध पिलाएगी ? पर देखो, मुझ से उसके बुढ़ापे में एक पुत्र उत्पन्न हुआ। 8 और वह लड़का बढ़ा और उसका दूध छुड़ाया गया : और इसहाक के दूध छुड़ाने के दिन इब्राहीम ने बड़ी जेवनार की। 9 तब सारा को मिस्री हाजिरा का पुत्र, जो इब्राहीम से उत्पन्न हुआ या, हंसी करता हुआ देख पड़ा। 10 सो इस कारण उस ने इब्राहीम से कहा, इस दासी को पुत्र सहित बरबस निकाल दे : क्योंकि इस दासी का पुत्र मेरे पुत्र इसहाक के साय भागी न होगा। 11 यह बात इब्राहीम को अपके पुत्र के कारण बुरी लगी। 12 तब परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, उस लड़के और अपक्की दासी के कारण तुझे बुरा न लगे; जो बात सारा तुझ से कहे, उसे मान, क्योंकि जो तेरा वंश कहलाएगा सो इसहाक ही से चलेगा। 13 दासी के पुत्र से भी मैं एक जाति उत्पन्न करूंगा इसलिथे कि वह तेरा वंश है। 14 सो इब्राहीम ने बिहान को तड़के उठकर रोटी और पानी से भरी चमड़े की यैली भी हाजिरा को दी, और उसके कन्धे पर रखी, और उसके लड़के को भी उसे देकर उसको विदा किया : सो वह चक्की गई, और बेर्शेबा के जंगल में भ्रमण करने लगी। 15 जब यैली का जल चुक गया, तब उस ने लड़के को एक फाड़ी के नीचे छोड़ दिया। 16 और आप उस से तीर भर के टप्पे पर दूर जाकर उसके साम्हने यह सोचकर बैठ गई, कि मुझ को लड़के की मृत्यु देखनी न पके। तब वह उसके साम्हने बैठी हुई चिल्ला चिल्ला के रोने लगी। 17 और परमेश्वर ने उस लड़के की सुनी; और उसके दूत ने स्वर्ग से हाजिरा को पुकार के कहा, हे हाजिरा तुझे क्या हुआ ? मत डर; क्योंकि जहां तेरा लड़का है वहां से उसकी आवाज परमेश्वर को सुन पक्की है। 18 उठ, अपके लड़के को उठा और अपके हाथ से सम्भाल क्योंकि मैं उसके द्वारा एक बड़ी जाति बनाऊंगा। 19 परमेश्वर ने उसकी आंखे खोल दी, और उसको एक कुंआ दिखाई पड़ा; सो उस ने जाकर यैली को जल से भरकर लड़के को पिलाया। 20 और परमेश्वर उस लड़के के साय रहा; और जब वह बड़ा हुआ, तब जंगल में रहते रहते धनुर्धारी बन गया। 21 वह तो पारान नाम जंगल में रहा करता या : और उसकी माता ने उसके लिथे मिस्र देश से एक स्त्री मंगवाई।। 22 उन दिनोंमें ऐसा हुआ कि अबीमेलेक अपके सेनापति पीकोल को संग लेकर इब्राहीम से कहने लगा, जो कुछ तू करता है उस में परमेश्वर तेरे संग रहता है : 23 सो अब मुझ से यहां इस विषय में परमेश्वर की किरिया खा, कि तू न तो मुझ से छल करेगा, और न कभी मेरे वंश से करेगा, परन्तु जैसी करूणा मैं ने तुझ पर की है, वैसी ही तू मुझ पर और इस देश पर भी जिस में तू रहता है करेगा 24 इब्राहीम ने कहा, मैं किरिया खाऊंगा। 25 और इब्राहीम ने अबीमेलेक को एक कुएं के विषय में, जो अबीमेलेक के दासोंने बरीयाई से ले लिया या, उलाहना दिया। 26 तब अबीमेलेक ने कहा, मै नहीं जानता कि किस ने यह काम किया : और तू ने भी मुझे नहीं बताया, और न मै ने आज से पहिले इसके विषय में कुछ सुना। 27 तक इब्राहीम ने भेड़-बकरी, और गाय-बैल लेकर अबीमेलेक को दिए; और उन दोनोंने आपस में वाचा बान्धी। 28 और इब्राहीम ने भेड़ की सात बच्ची अलग कर रखीं। 29 तब अबीमेलेक ने इब्राहीम से पूछा, इन सात बच्चियोंका, जो तू ने अलग कर रखी हैं, क्या प्रयोजन है ? 30 उस ने कहा, तू इन सात बच्चियोंको इस बात की साझी जानकर मेरे हाथ से ले, कि मै ने कुंआ खोदा है। 31 उन दोनोंने जो उस स्यान में आपस में किरिया खाई, इसी कारण उसका नाम बेर्शेबा पड़ा। 32 जब उन्होंने बेर्शेबा में परस्पर वाचा बान्धी, तब अबीमेलेक, और उसका सेनापति पीकोल उठकर पलिश्तियोंके देश में लौट गए। 33 और इब्राहीम ने बेर्शेबा में फाऊ का एक वृझ लगाया, और वहां यहोवा, जो सनातन ईश्वर है, उस से प्रार्यना की। 34 और इब्राहीम पलिश्तियोंके देश में बहुत दिनोंतक परदेशी होकर रहा।। उत्पत्ति 22 1 इन बातोंके पश्चात्‌ ऐसा हुआ कि परमेश्वर ने, इब्राहीम से यह कहकर उसकी पक्कीझा की, कि हे इब्राहीम : उस ने कहा, देख, मैं यहां हूं। 2 उस ने कहा, अपके पुत्र को अर्यात्‌ अपके एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा, और वहां उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊंगा होमबलि करके चढ़ा। 3 सो इब्राहीम बिहान को तड़के उठा और अपके गदहे पर काठी कसकर अपके दो सेवक, और अपके पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिथे लकड़ी चीर ली; तब कूच करके उस स्यान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्वर ने उस से की यी। 4 तीसरे दिन इब्राहीम ने आंखें उठाकर उस स्यान को दूर से देखा। 5 और उस ने अपके सेवकोंसे कहा गदहे के पास यहीं ठहरे रहो; यह लड़का और मैं वहां तक जाकर, और दण्डवत्‌ करके, फिर तुम्हारे पास लौट आऊंगा। 6 सो इब्राहीम ने होमबलि की लकड़ी ले अपके पुत्र इसहाक पर लादी, और आग और छुरी को अपके हाथ में लिया; और वे दोनोंएक साय चल पके। 7 इसहाक ने अपके पिता इब्राहीम से कहा, हे मेरे पिता; उस ने कहा, हे मेरे पुत्र, क्या बात है उस ने कहा, देख, आग और लकड़ी तो हैं; पर होमबलि के लिथे भेड़ कहां है ? 8 इब्राहीम ने कहा, हे मेरे पुत्र, परमेश्वर होमबलि की भेड़ का उपाय आप ही करेगा। 9 सो वे दोनोंसंग संग आगे चलते गए। और वे उस स्यान को जिसे परमेश्वर ने उसको बताया या पहुंचे; तब इब्राहीम ने वहां वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपके पुत्र इसहाक को बान्ध के वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। 10 और इब्राहीम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपके पुत्र को बलि करे। 11 तब यहोवा के दूत ने स्वर्ग से उसको पुकार के कहा, हे इब्राहीम, हे इब्राहीम; उस ने कहा, देख, मैं यहां हूं। 12 उस ने कहा, उस लड़के पर हाथ मत बढ़ा, और न उस से कुछ कर : क्योंकि तू ने जो मुझ से अपके पुत्र, वरन अपके एकलौते पुत्र को भी, नहीं रख छोड़ा; इस से मै अब जान गया कि तू परमेश्वर का भय मानता है। 13 तब इब्राहीम ने आंखे उठाई, और क्या देखा, कि उसके पीछे एक मेढ़ा अपके सींगो से एक फाड़ी में बफा हुआ है : सो इब्राहीम ने जाके उस मेंढ़े को लिया, और अपके पुत्र की सन्ती होमबलि करके चढ़ाया। 14 और इब्राहीम ने उस स्यान का नाम यहोवा यिरे रखा : इसके अनुसार आज तक भी कहा जाता है, कि यहोवा के पहाड़ पर उपाय किया जाएगा। 15 फिर यहोवा के दूत ने दूसरी बार स्वर्ग से इब्राहीम को पुकार के कहा, 16 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपक्की ही यह शपय खाता हूं, कि तू ने जो यह काम किया है कि अपके पुत्र, वरन अपके एकलौते पुत्र को भी, नहीं रख छोड़ा; 17 इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूंगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकोंके समान अनगिनित करूंगा, और तेरा वंश अपके शत्रुओं के नगरोंका अधिक्कारनेी होगा : 18 और पृय्वी की सारी जातियां अपके को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी : क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है। 19 तब इब्राहीम अपके सेवकोंके पास लौट आया, और वे सब बेर्शेबा को संग संग गए; और इब्राहीम बेर्शेबा में रहता रहा।। 20 इन बातोंके पश्चात्‌ ऐसा हुआ कि इब्राहीम को यह सन्देश मिला, कि मिल्का के तेरे भाई नाहोर से सन्तान उत्पन्न हुए हैं। 21 मिल्का के पुत्र तो थे हुए, अर्यात्‌ उसका जेठा ऊस, और ऊस का भाई बूज, और कमूएल, जो अराम का पिता हुआ। 22 फिर केसेद, हज़ो, पिल्दाश, यिद्‌लाप, और बतूएल। 23 इन आठोंको मिल्का इब्राहीम के भाई नाहोर के जन्माए जनी। और बतूएल ने रिबका को उत्पन्न किया। 24 फिर नाहोर के रूमा नाम एक रखेली भी यी; जिस से तेबह, गहम, तहश, और माका, उत्पन्न हुए।। उत्पत्ति 23 1 सारा तो एक सौ सत्ताईस बरस की अवस्या को पहुंची; और जब सारा की इतनी अवस्या हुई; 2 तब वह किर्यतर्बा में मर गई। यह तो कनान देश में है, और हेब्रोन भी कहलाता है : सो इब्राहीम सारा के लिथे रोने पीटने को वंहा गया। 3 तब इब्राहीम अपके मुर्दे के पास से उठकर हित्तियोंसे कहने लगा, 4 मैं तुम्हारे बीच पाहुन और परदेशी हूं : मुझे अपके मध्य में कब्रिस्तान के लिथे ऐसी भूमि दो जो मेरी निज की हो जाए, कि मैं अपके मुर्दे को गाड़के अपके आंख की ओट करूं। 5 हित्तियोंने इब्राहीम से कहा, 6 हे हमारे प्रभु, हमारी सुन : तू तो हमारे बीच में बड़ा प्रधान है : सो हमारी कब्रोंमें से जिसको तू चाहे उस में अपके मुर्दे को गाड़; हम में से कोई तुझे अपक्की कब्र के लेने से न रोकेगा, कि तू अपके मुर्दे को उस में गाड़ने न पाए। 7 तब इब्राहीम उठकर खड़ा हुआ, और हित्तियोंके सम्मुख, जो उस देश के निवासी थे, दण्डवत करके कहने लगा, 8 यदि तुम्हारी यह इच्छा हो कि मैं अपके मुर्दे को गाड़के अपक्की आंख की ओट करूं, तो मेरी प्रार्यना है, कि सोहर के पुत्र एप्रोन से मेरे लिथे बिनती करो, 9 कि वह अपक्की मकपेलावाली गुफा, जो उसकी भूमि की सीमा पर है; उसका पूरा दाम लेकर मुझे दे दे, कि वह तुम्हारे बीच कब्रिस्तान के लिथे मेरी निज भूमि हो जाए। 10 और एप्रोन तो हित्तियोंके बीच वहां बैठा हुआ या। सो जितने हित्ती उसके नगर के फाटक से होकर भीतर जाते थे, उन सभोंके साम्हने उस ने इब्राहीम को उत्तर दिया, 11 कि हे मेरे प्रभु, ऐसा नहीं, मेरी सुन; वह भूमि मैं तुझे देता हूं, और उस में जो गुफा है, वह भी मैं तुझे देता हूं; अपके जातिभाइयोंके सम्मुख मैं उसे तुझ को दिए देता हूं: सो अपके मुर्दे को कब्र में रख। 12 तब इब्राहीम ने उस देश के निवासियोंके साम्हने दण्डवत की। 13 और उनके सुनते हुए एप्रोन से कहा, यदि तू ऐसा चाहे, तो मेरी सुन : उस भूमि का जो दाम हो, वह मैं देना चाहता हूं; उसे मुझ से ले ले, तब मैं अपके मुर्दे को वहां गाडूंगा। 14 एप्रोन ने इब्राहीम को यह उत्तर दिया, 15 कि, हे मेरे प्रभु, मेरी बात सुन; एक भूमि का दाम तो चार सौ शेकेल रूपा है; पर मेरे और तेरे बीच में यह क्या है ? अपके मुर्दे को कब्र मे रख। 16 इब्राहीम न एप्रोन की मानकर उसको उतना रूपा तौल दिया, जितना उस ने हित्तियोंके सुनते हुए कहा या, अर्यात्‌ चार सौ ऐसे शेकेल जो व्यापारियोंमें चलते थे। 17 सो एप्रोन की भूमि, जो मम्रे के सम्मुख की मकपेला में यी, वह गुफा समेत, और उन सब वृझोंसमेत भी जो उस में और उसके चारोंऔर सीमा पर थे, 18 जितने हित्ती उसके नगर के फाटक से होकर भीतर जाते थे, उन सभोंके साम्हने इब्राहीम के अधिक्कारने में पक्की रीति से आ गई। 19 इसके पश्चात्‌ इब्राहीम ने अपक्की पत्नी सारा को, उस मकपेला वाली भूमि की गुफा में जो मम्रे के अर्यात्‌ हेब्रोन के साम्हने कनान देश में है, मिट्टी दी। 20 और वह भूमि गुफा समेत, जो उस में यी, हित्तियोंकी ओर से कब्रिस्तान के लिथे इब्राहीम के अधिक्कारने में पक्की रीति से आ गई। उत्पत्ति 24 1 इब्राहीम वृद्ध या और उसकी आयु बहुत भी और यहोवा ने सब बातोंमें उसको आशीष दी यी। 2 सो इब्राहीम ने अपके उस दास से, जो उसके घर में पुरनिया और उसकी सारी सम्पत्ति पर अधिक्कारनेी या, कहा, अपना हाथ मेरी जांघ के नीचे रख : 3 और मुझ से आकाश और पृय्वी के परमेश्वर यहोवा की इस विषय में शपय खा, कि तू मेरे पुत्र के लिथे कनानियोंकी लड़कियोंमें से जिनके बीच मैं रहता हूं, किसी को न ले आएगा। 4 परन्तु तू मेरे देश में मेरे ही कुटुम्बियोंके पास जाकर मेरे पुत्र इसहाक के लिथे एक पत्नी ले आएगा। 5 दास ने उस से कहा, कदाचित्‌ वह स्त्री इस देश में मेरे साय आना न चाहे; तो क्या मुझे तेरे पुत्र को उस देश में जहां से तू आया है ले जाना पकेगा ? 6 इब्राहीम ने उस से कहा, चौकस रह, मेरे पुत्र को वहां कभी न ले जाना। 7 स्वर्ग का परमेश्वर यहोवा, जिस ने मुझे मेरे पिता के घर से और मेरी जन्मभूमि से ले आकर मुझ से शपय खाकर कहा, कि मैं यह देश तेरे वंश को दूंगा; वही अपना दूत तेरे आगे आगे भेजेगा, कि तू मेरे पुत्र के लिथे वहां से एक स्त्री ले आए। 8 और यदि वह स्त्री तेरे साय आना न चाहे तब तो तू मेरी इस शपय से छूट जाएगा : पर मेरे पुत्र को वहां न ले जाना। 9 तब उस दास ने अपके स्वामी इब्राहीम की जांघ के नीचे अपना हाथ रखकर उस से इसी विषय की शपय खाई। 10 तब वह दास अपके स्वामी के ऊंटो में से दस ऊंट छंाटकर उसके सब उत्तम उत्तम पदार्योंमें से कुछ कुछ लेकर चला : और मसोपोटामिया में नाहोर के नगर के पास पहुंचा। 11 और उस ने ऊंटोंको नगर के बाहर एक कुएं के पास बैठाया, वह संध्या का समय या, जिस समय स्त्रियां जल भरने के लिथे निकलती है। 12 सो वह कहने लगा, हे मेरे स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर, यहोवा, आज मेरे कार्य को सिद्ध कर, और मेरे स्वामी इब्राहीम पर करूणा कर। 13 देख मैं जल के इस सोते के पास खड़ा हूं; और नगरवासियोंकी बेटियोंजल भरने के लिथे निकली आती हैं : 14 सो ऐसा होने दे, कि जिस कन्या से मैं कहूं, कि अपना घड़ा मेरी ओर फुका, कि मैं पीऊं; और वह कहे, कि ले, पी ले, पीछे मैं तेरे ऊंटो को भी पीलाऊंगी : सो वही हो जिसे तू ने अपके दास इसहाक के लिथे ठहराया हो; इसी रीति मैं जान लूंगा कि तू ने मेरे स्वामी पर करूणा की है। 15 और ऐसा हुआ कि जब वह कह ही रहा या कि रिबका, जो इब्राहीम के भाई नाहोर के जन्माथे मिल्का के पुत्र, बतूएल की बेटी यी, वह कन्धे पर घड़ा लिथे हुए आई। 16 वह अति सुन्दर, और कुमारी यी, और किसी पुरूष का मुंह न देखा या : वह कुएं में सोते के पास उतर गई, और अपना घड़ा भर के फिर ऊपर आई। 17 तब वह दास उस से भेंट करने को दौड़ा, और कहा, अपके घड़े मे से योड़ा पानी मुझे पिला दे। 18 उस ने कहा, हे मेरे प्रभु, ले, पी ले: और उस ने फुर्ती से घड़ा उतारकर हाथ में लिथे लिथे उसको पिला दिया। 19 जब वह उसको पिला चुकी, तक कहा, मैं तेरे ऊंटोंके लिथे भी तब तक पानी भर भर लाऊंगी, जब तक वे पी न चुकें। 20 तब वह फुर्ती से अपके घड़े का जल हौदे में उण्डेलकर फिर कुएं पर भरने को दौड़ गई; और उसके सब ऊंटोंके लिथे पानी भर दिया। 21 और वह पुरूष उसकी ओर चुपचाप अचम्भे के साय ताकता हुआ यह सोचता या, कि यहोवा ने मेरी यात्रा को सुफल किया है कि नहीं। 22 जब ऊंट पी चुके, तब उस पुरूष ने आध तोले सोने का एक नत्य निकालकर उसको दिया, और दस तोले सोने के कंगन उसके हाथोंमें पहिना दिए; 23 और पूछा, तू किस की बेटी है? यह मुझ को बता दे। क्या तेरे पिता के घर में हमारे टिकने के लिथे स्यान है ? 24 उस ने उत्तर दिया, मैं तो नाहोर के जन्माए मिल्का के पुत्र बतूएल की बेटी हूं। 25 फिर उस ने उस से कहा, हमारे वहां पुआल और चारा बहुत है, और टिकने के लिथे स्यान भी है। 26 तब उस पुरूष ने सिर फुकाकर यहोवा को दण्डवत्‌ करके कहा, 27 धन्य है मेरे स्वामी इब्राहीम का परमेश्वर यहोवा, कि उस ने अपक्की करूणा और सच्चाई को मेरे स्वामी पर से हटा नहीं लिया : यहोवा ने मुझ को ठीक मार्ग पर चलाकर मेरे स्वामी के भाई बन्धुओं के घर पर पहुचा दिया है। 28 और उस क्न्या ने दौड़कर अपक्की माता के घर में यह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। 29 तब लाबान जो रिबका का भाई या, सो बाहर कुएं के निकट उस पुरूष के पास दौड़ा गया। 30 और ऐसा हुआ कि जब उस ने वह नत्य और अपक्की बहिन रिबका के हाथोंमें वे कंगन भी देखे, और उसकी यह बात भी सुनी, कि उस पुरूष ने मुझ से ऐसी बातें कहीं; तब वह उस पुरूष के पास गया; और क्या देखा, कि वह सोते के निकट ऊंटोंके पास खड़ा है। 31 उस ने कहा, हे यहोवा की ओर से धन्य पुरूष भीतर आ : तू क्योंबाहर खड़ा है ? मैं ने घर को, और ऊंटो के लिथे भी स्यान तैयार किया है। 32 और वह पुरूष घर में गया; और लाबान ने ऊंटोंकी काठियां खोलकर पुआल और चारा दिया; और उसके, और उसके संगी जनो के पांव धोने को जल दिया। 33 तब इब्राहीम के दास के आगे जलपान के लिथे कुछ रखा गया : पर उस ने कहा मैं जब तक अपना प्रयोजन न कह दूं, तब तक कुछ न खाऊंगा। लाबान ने कहा, कह दे। 34 तक उस ने कहा, मैं तो इब्राहीम का दास हूं। 35 और यहोवा ने मेरे स्वामी को बड़ी आशीष दी है; सो वह महान पुरूष हो गया है; और उस ने उसको भेड़-बकरी, गाय-बैल, सोना-रूपा, दास-दासियां, ऊंट और गदहे दिए है। 36 और मेरे स्वामी की पत्नी सारा के बुढ़ापे में उस से एक पुत्र उत्पन्न हुआ है। और उस पुत्र को इब्राहीम ने अपना सब कुछ दे दिया है। 37 और मेरे स्वामी ने मुझे यह शपय खिलाई, कि मैं उसके पुत्र के लिथे कनानियोंकी लड़कियोंमें से जिन के देश में वह रहता है, कोई स्त्री न ले आऊंगा। 38 मैं उसके पिता के घर, और कुल के लोगोंके पास जाकर उसके पुत्र के लिथे एक स्त्री ले आऊंगा। 39 तब मैं ने अपके स्वामी से कहा, कदाचित्‌ वह स्त्री मेरे पीछे न आए। 40 तब उस ने मुझ से कहा, यहोवा, जिसके साम्हने मैं चलता आया हूं, वह तेरे संग अपके दूत को भेजकर तेरी यात्रा को सुफल करेगा; सो तू मेरे कुल, और मेरे पिता के घराने में से मेरे पुत्र के लिथे एक स्त्री ले आ सकेगा। 41 तू तब ही मेरी इस शपय से छूटेगा, जब तू मेरे कुल के लोगोंके पास पहुंचेगा; अर्यात्‌ यदि वे मुझे कोई स्त्री न दें, तो तू मेरी श्पय से छूटेगा। 42 सो मैं आज उस कुएं के निकट आकर कहने लगा, हे मेरे स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर यहोवा, यदि तू मेरी इस यात्रा को सुफल करता हो : 43 तो देख मैं जल के इस कुएं के निकट खड़ा हूं; सो ऐसा हो, कि जो कुमारी जल भरने के लिथे निकल आए, और मैं उस से कहूं, अपके घड़े में से मुझे योड़ा पानी पिला; 44 और वह मुझ से कहे, पी ले और मै तेरे ऊंटो के पीने के लिथे भी पानी भर दूंगी : वह वही स्त्री हो जिसको तू ने मेरे स्वामी के पुत्र के लिथे ठहराया हो। 45 मैं मन ही मन यह कह ही रहा या, कि देख रिबका कन्धे पर घड़ा लिथे हुए निकल आई; फिर वह सोते के पास उतरके भरने लगी : और मै ने उस से कहा, मुझे पिला दे। 46 और उस ने फुर्ती से अपके घड़े को कन्धे पर से उतारके कहा, ले, पी ले, पीछे मैं तेरे ऊंटोंको भी पिलाऊंगी : सो मैं ने पी लिया, और उस ने ऊंटोंको भी पिला दिया। 47 तब मैं ने उस से पूछा, कि तू किस की बेटी है ? और उस ने कहा, मैं तो नाहोर के जन्माए मिल्का के पुत्र बतूएल की बेटी हूं : तब मैं ने उसकी नाक में वह नत्य, और उसके हाथोंमें वे कंगन पहिना दिए। 48 फिर मैं ने सिर फुकाकर यहोवा को दण्डवत्‌ किया, और अपके स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर यहोवा को धन्य कहा, क्योंकि उस ने मुझे ठीक मार्ग से पहुंचाया कि मै अपके स्वामी के पुत्र के लिथे उसकी भतीजी को ले जाऊं। 49 सो अब, यदि तू मेरे स्वामी के साय कृपा और सच्चाई का व्यवहार करना चाहते हो, तो मुझ से कहो : और यदि नहीं चाहते हो, तौभी मुझ से कह दो; ताकि मैं दाहिनी ओर, वा बाईं ओर फिर जाऊं। 50 तब लाबान और बतूएल ने उत्तर दिया, यह बात यहोवा की ओर से हुई है : सो हम लोग तुझ से न तो भला कह सकते हैं न बुरा। 51 देख, रिबका तेरे साम्हने है, उसको ले जा, और वह यहोवा के वचन के अनुसार, तेरे स्वामी के पुत्र की पत्नी हो जाए। 52 उनका यह वचन सुनकर, इब्राहीम के दास ने भूमि पर गिरके यहोवा को दण्डवत्‌ किया। 53 फिर उस दास ने सोने और रूपे के गहने, और वस्त्र निकालकर रिबका को दिए : और उसके भाई और माता को भी उस ने अनमोल अनमोल वस्तुएं दी। 54 तब उस ने अपके संगी जनोंसमेत भोजन किया, और रात वहीं बिताई : और तड़के उठकर कहा, मुझ को अपके स्वामी के पास जाने के लिथे विदा करो। 55 रिबका के भाई और माता ने कहा, कन्या को हमारे पास कुछ दिन, अर्यात्‌ कम से कम दस दिन रहने दे; फिर उसके पश्चात्‌ वह चक्की जाएगी। 56 उस ने उन से कहा, यहोवा ने जो मेरी यात्रा को सुफल किया है; सो तुम मुझे मत रोको अब मुझे विदा कर दो, कि मैं अपके स्वामी के पास जाऊं। 57 उन्होंने कहा, हम कन्या को बुलाकर पूछते हैं, और देखेंगे, कि वह क्या कहती है। 58 सो उन्होंने रिबका को बुलाकर उस से पूछा, क्या तू इस मनुष्य के संग जाएगी? उस ने कहा, हां मैं जाऊंगी। 59 तब उन्होंने अपक्की बहिन रिबका, और उसकी धाय और इब्राहीम के दास, और उसके सायी सभोंको विदा किया। 60 और उन्होंने रिबका को आशीर्वाद देके कहा, हे हमारी बहिन, तू हजारोंलाखोंकी आदिमाता हो, और तेरा वंश अपके बैरियोंके नगरोंका अधिक्कारनेी हो। 61 इस पर रिबका अपक्की सहेलियोंसमेत चक्की; और ऊंट पर चढ़के उस पुरूष के पीछे हो ली : सो वह दास रिबका को साय लेकर चल दिया। 62 इसहाक जो दक्खिन देश में रहता या, सो लहैरोई नाम कुएं से होकर चला आता या। 63 और सांफ के समय वह मैदान में ध्यान करने के लिथे निकला या : और उस ने आंखे उठाकर क्या देखा, कि ऊंट चले आ रहे हैं। 64 और रिबका ने भी आंख उठाकर इसहाक को देखा, और देखते ही ऊंट पर से उतर पक्की 65 तब उस ने दास से पूछा, जो पुरूष मैदान पर हम से मिलने को चला आता है, सो कौन है? दास ने कहा, वह तो मेरा स्वामी है। तब रिबका ने घूंघट लेकर अपके मुंह को ढ़ाप लिया। 66 और दास ने इसहाक से अपना सारा वृत्तान्त वर्णन किया। 67 तब इसहाक रिबका को अपक्की माता सारा के तम्बू में ले आया, और उसको ब्याहकर उस से प्रेम किया : और इसहाक को माता की मृत्यु के पश्चात्‌ शान्ति हुई।। उत्पत्ति 25 1 तब इब्राहीम ने एक और पत्नी ब्याह ली जिसका नाम कतूरा या। 2 और उस से जिम्रान, योझान, मदना, मिद्यान, यिशबाक, और शूह उत्पन्न हुए। 3 और योझान से शबा और ददान उत्पन्न हुए। और ददान के वंश में अश्शूरी, लतूशी, और लुम्मी लोग हुए। 4 और मिद्यान के पुत्र एपा, एपेर, हनोक, अबीदा, और एल्दा हुए, से सब कतूरा के सन्तान हुए। 5 इसहाक को तो इब्राहीम ने अपना सब कुछ दिया। 6 पर अपक्की रखेलियोंके पुत्रोंको, कुछ कुछ देकर अपके जीते जी अपके पुत्र इसहाक के पास से पूरब देश में भेज दिया। 7 इब्राहीम की सारी अवस्या एक सौ पचहत्तर वर्ष की हुई। 8 और इब्राहीम का दीर्घायु होने के कारण अर्यात्‌ पूरे बुढ़ापे की अवस्या में प्राण छूट गया। 9 और उसके पुत्र इसहाक और इश्माएल ने, हित्ती सोहर के पुत्र एप्रोन की मम्रे के सम्मुखवाली भूमि में, जो मकपेला की गुफा यी, उस में उसको मिट्टी दी गई। 10 अर्यात्‌ जो भूमि इब्राहीम ने हित्तियोंसे मोल ली यी : उसी में इब्राहीम, और उस की पत्नी सारा, दोनोंको मिट्टी दी गई। 11 इब्राहीम के मरने के पश्चात्‌ परमेश्वर ने उसके पुत्र इसहाक को जो लहैरोई नाम कुएं के पास रहता या आशीष दी।। 12 इब्राहीम का पुत्र इश्माएल जो सारा की लौंडी हाजिरा मिस्री से उत्पन्न हुआ या, उसकी यह वंशावली है। 13 इश्माएल के पुत्रोंके नाम और वंशावली यह है : अर्यात्‌ इश्माएल का जेठा पुत्र नबायोत, फिर केदार, अद्‌बेल, मिबसाम, 14 मिश्मा, दूमा, मस्सा, 15 हदर, तेमा, यतूर, नपीश, और केदमा। 16 इश्माएल के पुत्र थे ही हुए, और इन्हीं के नामोंके अनुसार इनके गांवों, और छावनियोंके नाम भी पके; और थे ही बारह अपके अपके कुल के प्रधान हुए। 17 इश्माएल की सारी अवस्या एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई : तब उसके प्राण छूट गए, और वह अपके लोगोंमें जा मिला। 18 और उसके वंश हवीला से शूर तक, जो मिस्र के सम्मुख अश्शूर्‌ के मार्ग में है, बस गए। और उनका भाग उनके सब भाईबन्धुओं के सम्मुख पड़ा।। 19 इब्राहीम के पुत्र इसहाक की वंशावली यह है : इब्राहीम से इसहाक उत्पन्न हुआ। 20 और इसहाक ने चालीस वर्ष का होकर रिबका को, जो पद्दनराम के वासी, अरामी बतूएल की बेटी, और अरामी लाबान की बहिन भी, ब्याह लिया। 21 इसहाक की पत्नी तो बांफ यी, सो उस ने उसके निमित्त यहोवा से बिनती की: और यहोवा ने उसकी बिनती सुनी, सो उसकी पत्नी रिबका गर्भवती हुई। 22 और लड़के उसके गर्भ में आपस में लिपटके एक दूसरे को मारने लगे : तब उस ने कहा, मेरी जो ऐसी ही दशा रहेगी तो मैं क्योंकर जीवित रहूंगी? और वह यहोवा की इच्छा पूछने को गई। 23 तब यहोवा ने उस से कहा तेरे गर्भ में दो जातियां हैं, और तेरी कोख से निकलते ही दो राज्य के लोग अलग अलग होंगे, और एक राज्य के लोग दूसरे से अधिक सामर्यी होंगे और बड़ा बेटा छोटे के अधीन होगा। 24 जब उसके पुत्र उत्पन्न होने का समय आया, तब क्या प्रगट हुआ, कि उसके गर्भ में जुड़वे बालक है। 25 और पहिला जो उत्पन्न हुआ सो लाल निकला, और उसका सारा शरीर कम्बल के समान रोममय या; सो उसका नाम एसाव रखा गया। 26 पीछे उसका भाई अपके हाथ से एसाव की एड़ी पकडे हुए उत्पन्न हुआ; और उसका नाम याकूब रखा गया। और जब रिबका ने उनको जन्म दिया तब इसहाक साठ वर्ष का या। 27 फिर वे लड़के बढ़ने लगे और एसाव तो वनवासी होकर चतुर शिकार खेलनेवाला हो गया, पर याकूब सीधा मनुष्य या, और तम्बुओं में रहा करता या। 28 और इसहाक तो एसाव के अहेर का मांस खाया करता या, इसलिथे वह उस से प्रीति रखता या : पर रिबका याकूब से प्रीति रखती यी।। 29 याकूब भोजन के लिथे कुछ दाल पका रहा या : और एसाव मैदान से यका हुआ आया। 30 तब एसाव ने याकूब से कहा, वह जो लाल वस्तु है, उसी लाल वस्तु में से मुझे कुछ खिला, क्योंकि मैं यका हूं। इसी कारण उसका नाम एदोम भी पड़ा। 31 याकूब ने कहा, अपना पहिलौठे का अधिक्कारने आज मेरे हाथ बेच दे। 32 एसाव ने कहा, देख, मै तो अभी मरने पर हूं : सो पहिलौठे के अधिक्कारने से मेरा क्या लाभ होगा ? 33 याकूब ने कहा, मुझ से अभी शपय खा : सो उस ने उस से शपय खाई : और अपना पहिलौठे का अधिक्कारने याकूब के हाथ बेच डाला। 34 इस पर याकूब ने एसाव को रोटी और पकाई हुई मसूर की दाल दी; और उस ने खाया पिया, तब उठकर चला गया। योंएसाव ने अपना पहिलौठे का अधिक्कारने तुच्छ जाना।। 